वाल्मीकि रामायण को जन तक पहुंचाने के लिए गोस्वामी तुलसीदास ने श्री रामचरितमानस की रचना

श्रावण मास में शुक्ल सप्तमी को गोस्वामी तुलसीदास का जन्म हुआ। जन्म के साथ ही राम नाम बोलने के कारण उन्हें रामबोला भी पुकारा गया। गुरु नरहरि ने रामबोला को दीक्षा दी और तुलसीदास नाम दिया। गोस्वामी तुलसीदास ने कुल 12 पुस्तकों की रचना की। उनके द्वारा रचित श्री रामचरितमानस को सबसे अधिक ख्याति मिली। इस महान ग्रंथ की रचना गोस्वामी तुलसीदास ने अवधी भाषा में की। वाल्मीकि रामायण को जन सामान्य तक पहुंचाने के लिए गोस्वामी तुलसीदास ने श्री रामचरितमानस की रचना की।

गोस्वामी तुलसीदास का अधिकांश जीवन चित्रकूट, काशी और अयोध्या में व्यतीत हुआ। उनके द्वारा रचित ग्रंथों में श्रीरामचरित मानस, कवितावली, जानकीमंगल, विनयपत्रिका, गीतावली, हनुमान चालीसा आदि प्रमुख रचनाएं हैं। श्रीरामचरितमानस के बाद हनुमान चालीसा तुलसीदास जी की लोकप्रिय रचना है। जानकी मंगल में गोस्वामी तुलसीदास ने श्रीजानकी एवं पुरुषोत्तम श्रीराम के मंगलमय विवाहोत्सव का वर्णन किया है। हनुमान चालीसा चालीस चौपाइयों में वर्णित है। इस रचना में पवनपुत्र हनुमान की सुंदर स्तुति की गई है। काशी में गोस्वामी तुलसीदास ने अपना अंतिम समय व्यतीत किया और श्रीराम नाम का स्मरण करते हुए शरीर त्याग दिया। गोस्वामी तुलसीदास के पिता का नाम आत्माराम और माता का नाम हुलसी देवी था। कहा जाता है कि जन्म के समय तुलसीदास रोये नहीं और उनके मुख में पूरे 32 दांत थे। उन्हें अपनी पत्नी रत्नावली से अत्यंत लगाव था। एक बार पत्नी से मिलने के लिए उन्होंने उफनती नदी को भी पार कर लिया। तब पत्नी ने कहा, जितना प्रेम इस हाड़-मांस के बने शरीर से कर रहे हो, उतना स्नेह यदि प्रभु श्रीराम से करते तो तुम्हें मोक्ष की प्राप्ति हो जाती। यह सुनते ही तुलसीदास की चेतना जागी और प्रभु श्रीराम की स्तुति में जुट गए। गोस्वामी तुलसीदास ने मानव जाति को भगवान श्रीराम के आदर्शों से जोड़ा।

नोट:
इस आलेख में दी गई जानकारियां धार्मिक आस्थाओं और लौकिक मान्यताओं पर आधारित हैं, जिसे मात्र सामान्य जनरुचि को ध्यान में रखकर प्रस्तुत किया गया है।



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