नहीं रहीं सुषमा स्वराज, जेपी आंदोलन का हिस्सा थीं सुषमा स्वराज

07 अगस्त 2019

जेपी आंदोलन का हिस्सा थीं सुषमा स्वराज! इंदिरा गांधी से लेकर सोनिया तक से लिया लोहा!
अपनी ओजस्वी वाणी से लोगों का मन मोह लेने वालीं सुषमा स्वराज अब हमारे बीच नहीं हैं । उनके जाने से भारतीय राजनीति में एक शून्यता आ गई है । अंबाला के सनातन धर्म कॉलेज में पढ़ाई के दौरान ही सुषमा का राजनीति में रुझान दिखने लगा । वे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़ गईं लेकिन तेवर आपातकाल के दौरान सामने आए, जब वे जयप्रकाश नारायण के सम्पूर्ण क्रांति आंदोलन का हिस्सा बनीं थीं।

आपातकाल में इंदिरा गांधी की निर्ममता के मद्देनजर उन्हें सत्ता से उखाड़ फेंकने के लिए उठाया गया ये कदम पूरे देश में आग की तरह फैल गया । इसके साथ ही जन्म हुआ राजनीतिज्ञ सुषमा स्वराज का ।आपातकाल में उन्होंने इंदिरा गांधी और बाद में विदेशी मूल के मुद्दे पर सोनिया गांधी से लोहा लिया. आपातकाल खत्म होने के साथ ही वे सक्रिय राजनीति के लिए जनता पार्टी से जुड़ गईं. साल 1977 में ही उन्होंने हरियाणा के श्रममंत्री का पद संभाला । तब उनकी उम्र सिर्फ 25 साल थी ।

भारतीय जनता पार्टी में अस्सी के दशक में शामिल होने के बाद से सुषमा का राजनैतिक कद लगातार बढ़ता गया. सुषमा स्वराज पर पार्टी का विश्वास इस कदर था कि 13 दिन की वाजपेयी सरकार में भी उन्हें सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय जैसा महत्वपूर्ण पद मिला। अगली बार बीजेपी के सत्ता में आने पर एक बार फिर सुषमा को दूरसंचार मंत्रालय के साथ सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय मिला । इस दौरान ऐतिहासिक फैसला लेते हुए सुषमा ने फिल्मी दुनिया को उद्योग घोषित कर दिया ताकि फिल्म बनाने वालों या फिल्म बनाने की चाह रखने वालों को भी बैंक से बाकायदा कर्ज मिल सके ।

सुषमा को बदलावों से कभी डर नहीं लगा, बल्कि उनके सहज स्वभाव में ही चुनौतियां स्वीकारना था. यही कारण है कि कर्नाटक में अपने चुनाव अभियानों के दौरान वे कन्नड़ में भाषण दिया करती थीं । सुषमा की राजनैतिक उपलब्धियों की सूची काफी लंबी है तो आम लोगों के बीच भी वे काफी लोकप्रिय हैं. दूसरी महिला राजनेताओं से अलग वे माथे पर लाल चमकती बड़ी बिंदी लगाकर करवाचौथ मनाती थीं. उनकी सोच और कार्यशैली इतनी स्पष्ट और वाणी इतनी प्रखर थी कि तथाकथित फेमिनिस्ट इसे स्त्रीविरोधी मूवमेंट कहते भी झिझकते हैं ।

साल 1973 में तेजतर्रार सुषमा ने सुप्रीम कोर्ट में बतौर अधिवक्ता करियर की शुरुआत की और इसके बाद से कामयाबी की सीढ़ियां चढ़ती ही गईं। इसी दौरान सुप्रीम कोर्ट में ही उनकी मुलाकात स्वराज कौशल से हुई । वैचारिक समानता और देश की सामाजिक-राजनैतिक चर्चाओं-बहसों के बीच दोनों एक-दूसरे को पसंद करने लगे और 1975 में उनका विवाह हो गया । दोनों का जोड़ टक्कर का रहा । कौशल के नाम भी कई उपलब्धियां दर्ज हैं, साथ ही वे छह साल तक राज्यसभा में सांसद भी रहे । दोनों की एक बेटी है बांसुरी स्वराज जो लंदन में वकालत कर रही है।



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