1955 बनाम 2019 : नरसंहार का असल सच, पढ़े पूरी खबर

25 जुलाई 2019

आनन्द कुमार चौबे (संवाददाता)

– पूरे केस में दो रहे दो टर्निंग पॉइन्ट

– प्रशासन चाहती तो रुक सकता था नरसंहार

– खुफिया तंत्र भी पूरी तरह रहा फेल

– आतीं संमय तक अफसरों में नहीं दिखा उत्साह

– साजिश के तरह लग रहे आरोप

– विपक्ष नरसंहार के लिए योगी सरकार को बताया जिम्मेदार

– सीएम योगी ने घटना को कांग्रेस का पाप बताया

– बड़ा सवाल, कि आखिर जांच के बाद थम जाएगा सोनभद्र में जमीनी विवाद

– घटना के कुछ दिनों बाद कोन की घटना ने खोल दी फिर प्रशासन की पोल

– तहसील दिवस, थाना दिवस व रोजमर्रा की सुनवाई के वावजूद क्यों कम नहीं हो रही जमीनी विवाद

सोनभद्र । इतिहास गवाह है कि जब जब नरसंहार हुआ उसके पीछे जर जोरू और जमीन रहा है। लेकिन फिर भी लोग इससे बच नहीं पाते । सोनभद्र के घोरावल तहसील अंतर्गत उभ्भा गांव की घटना इसका ताजा उदाहरण है, कि कैसे जमीन हथियाने के लिए 10 आदिवासियों को मौत के घाट उतार दिया गया । आदिवासी बाहुल्य इस जनपद में इस जमीन का रखवाला पूर्वजों से आदिवासियों के हाथों में रहा है । उबड़-खाबड़ व पथरीली जमीन को इन्ही आदिवासियों ने तराशकर आज खेती योग्य बनाया । जिसके बाद उस जमीन पर बड़े बड़े लोगों की गिद्ध निगाह टिकने लगी।

उभ्भा गांव की घटना भले ही 2019 में हुई हो मगर इसकी नींव 1955 में ही रख दी गयी थी । जब सरकार की जमीन गलत तरीके से नियमों को ताख पर रखकर आदर्श कोआपरेटिव सोसाइटी के नाम तत्कालीन तहसीलदार राबर्ट्सगंज के आदेश से ट्रांसफर कर दी गई। जबकि इस जमीन को ट्रांसफर करने का अधिकार तहसीलदार के पास था ही नहीं, यह अधिकार तहसीलदारों को उत्तर प्रदेश में 1960 में मिला है।

उभ्भा गाँव की कहानी सिर्फ जमीन पर कब्जे की नहीं है। बल्कि यह कहानी राजस्व वादों और कानून व्यवस्था में नाकामियों की कलाई खोलती है। पीड़ित पक्ष के वकील नित्यानंद द्विवेदी बताते हैं कि जमीन 1955 से 1989 तक सोसाइटी के नाम रही। 1989 में सोसाइटी के मंत्री और मैनेजर आरएस राव विनीता शर्मा ने सोसाइटी के नाम मुकदमा दर्ज कर इस जमीन जो कि 144-145 बीघा जमीन थी को अपने नाम दर्ज करा लिया। यह आदेश अवैध था। क्योंकि सोसाइटी की कोई भी जमीन सोसाइटी के प्रबंधक व मैनेजर के नाम ट्रांसफर ही नहीं की जा सकती है। वहीं इस मामले में तहसीलदार ने अपने आदेश में साफ लिखा था कि सोसाइटी की जमीन को किसी के नाम ट्रांसफर करना अवैध होगा क्योंकि यह 33/39 एक्ट का मामला नहीं है, बावजूद इसके एसडीएम राबर्ट्सगंज ने खतौनी में आशा मिश्रा और विनीता शर्मा का नाम दर्ज करने के आदेश दे दिये।

पीड़ित पक्ष के वकील द्विवेदी के मुताबिक इस जमीन को बेचने विनीता शर्मा के पिता विनीता शर्मा की पावर आफ अटार्नी लेकर आए, विनीता शर्मा नहीं आईं। वहीं नियम के मुताबिक जिस राज्य में खरीद बिक्री करनी होती है उसी राज्य की पावर आफ अटार्नी होनी चाहिए, लेकिन विनीता शर्मा के पिता दिल्ली की पावर आफ अटार्नी लेकर आए थे। यहां भी म्यूटेशन में एआरओ ओबरा ने गड़बड़ी की। एडवोकेट द्विवेदी कहते हैं कि यहाँ भी जिलाधिकारी ने उनकी आपत्ति को बगैर लोवर कोर्ट से पत्रावली तलब किये खारिज कर दिया। 6 जुलाई को आपत्ति खारिज की 16 जुलाई को हमें कापी मिली। हम कमिश्नर के यहां अपील करते उससे पहले यह हत्याकांड हो गया।


अपने शहर के एप को डाउनलोड करने के लिए क्लिक करे |  हमें फेसबुक,  ट्विटर,  और यूट्यूब पर फॉलो करें|
loading...
error: Content is protected !!