स्किन बैंक निभाते हैं अहम भूमिका, जानिए भारत में कब और कहां खुला पहला स्किन बैंक


प्लास्टिक एवं रीकंस्ट्रक्टिव सर्जरी के गंभीर मामलों में स्किन बैंक बेहद अहम रोल निभाते हैं। जलने या एक्सिडेंट के मामलों में जब बड़े पैमाने पर स्किन पैच या ग्राफ्ट की जरूरत पड़ती है, तब ये स्किन बैंक बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। लेकिन इनकी सीमित उपलब्धता के चलते मौजूदा स्किन बैंकों पर दबाव काफी ज्यादा है। फोर्टिस मेमोरियल रिसर्च इंस्टीट्यूट में प्लास्टिक एंड रीकंस्ट्रक्टिव सर्जरी विभाग में निदेशक डॉ. अनिल बहल का कहना है कि देशभर में स्किन बैंकों की संख्या बमुश्किल 8-10 हैं। हालांकि प्लास्टिक और रीकंट्रक्टिव सर्जरी में इनकी भूमिका को देखते हुए इनकी मौजूदगी बेहद महत्वपूर्ण है।

स्किन की जरूरत ऐसे सभी अस्पताल के प्लास्टिक एंड रीकंस्ट्रक्टिव सर्जरी विभाग को पड़ती है, जहां गंभीर रूप से जले या एक्सिडेंट के मामले अक्सर आते रहते हैं। कई सरकारी अस्पतालों में भी 30 फीसदी और इससे अधिक जलने के मामलों में इलाज किया जाता है। इन्हें भी स्किन बैंकों की मदद की जरूरत होती है। आइए जानें भारत में कब और कहां खुला था पहला स्किन बैंक :

भारत में पहला स्किन बैंक- नेशनल बर्न सेंटर 5 अक्टूबर, 2001 को मुंबई में शुरू किया गया था और त्वचा दान को बढ़ावा देने के लिए 2015 में गंगा हॉस्पिटल स्किन बैंक के शुरू होने तक यह देश का एकमात्र स्किन बैंक था। देश में त्वचा दान करने को लेकर कई प्रकार की भ्रांतियां फैली हुई हैं। जहां ब्रेन डेड व्यक्ति सिर्फ अंगदान कर सकता है, वहीं आंखों और त्वचा का दान केवल प्राकृतिक मृत्यु की स्थिति में ही किया जा सकता है।

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त्वचा मानव शरीर का सबसे बड़ा अंग है जो अंदरूनी अंगों को सुरक्षित रखता है, स्पर्श की संवेदना से युक्त है, और स्वाभाविक रूप से टूट-फूट होने पर यह अपनी मरम्मत करने में भी सक्षम होती है। लेकिन जलने या क्षतिग्रस्त होने पर त्वचा अपनी मरम्मत नहीं कर पाती है और ऐसे मामलों में स्किन ट्रांसप्लांट यानी त्वचा प्रत्यारोपण के विकल्प को प्राथमिकता दी जाती है। त्वचा दान करना व्यक्तिगत पसंद का मामला है और मृत व्यक्ति किसी भी प्रकार की चिकित्सकीय जटिलता से ग्रस्त होने के बावजूद, जांच के उपरांत त्वचा का दान कर सकता है। एड्स, एचआईवी, हेपेटाइटिस बी एवं सी, टीबी, पीलिया, एसटीडी, स्किन कैंसर, त्वचा की बीमारी और सेप्टीसीमिया से पीड़ित मृत व्यक्ति त्वचा दान नहीं कर सकते। दूसरे अंगों के प्रत्यारोपण की तुलना में, त्वचा को बिना रक्त एवं ऊतक मिलान के दान किया जा सकता है।

त्वचा को व्यक्ति की मृत्यु के छह घंटे के भीतर निकाला जा सकता है और 0.3 मिमी मोटाई के साथ जांघ, पैर और पीठ से एपिडर्मी और डर्मी के कुछ हिस्से को निकाला जाता है। चेहरे, हाथों, छाती या शरीर के ऊपरी हिस्से को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया जाता है। मृत व्यक्ति के पास डोनर कार्ड होने के बावजूद, परिजन ही त्वचा दान करने का निर्णय लेते हैं।


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