लघुवनोपज को कही भी बिक्री करने की छूट से होगा पर्यावरण संरक्षण तो आदिवासियों को मिलेगा रोजगार

रमेश यादव ( संवाददाता)

दुद्धी। उत्तर प्रदेश में सोनभद्र जनपद सहित कई ऐसे जनपद है जहां पर लघुवनोपज ( हर्रा, बहेरा, नागरमोथा, पियार,मूंगा, गुंजा, चिरौंजी, धौराफुल, वनतुलसी, गोंद इत्यादि ) अधिक मात्रा में जंगलो में पैदा होते है जिसकी बिक्री आदिवासी समाज के लोग वन विभाग द्वारा नामित किये गए वन निगम के दुकान पर करते हैं।वन निगम के अधिकारी और कर्मचारी केवल 25 प्रतिशत ही लघुवनोपज की खरीददारी करते है और 75 प्रतिशत लघुवनोपज जंगलों में ही नष्ट हो जाते है जबकि आदिवासी समाज के लोग और अधिक लघुवनोपज बेचना चाहते हैं लेकिन वन निगम लगभग 25 प्रतिशत ही क्रय करके इतिश्री कर लेता है। जंगलो में पैदा होने वाले लघुवनोपज को यदि आदिवासी परिवार इकटठा भी कर ले तो उसका लघुवनोपज बिक्री नही हो पायेगा और दूसरे किसी अन्य दुकान या व्यापारी के यहाँ वह बेच नही पायेगा क्योंकि लघुवनोपज खरीदने का अधिकार सिर्फ वन विभाग द्वारा नामित वन निगम के दुकान को होता है और यह पूरा माल खरीददारी नही कर पाता है या तो इसका लक्ष्य पूरा हो जाता है जबकि छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश और झारखण्ड में लघुवनोपज कही पर भी बेचा जा सकता है ।इसे कोई व्यापारी ले या कोई दुकानदार या वन निगम।
उक्त बातें भाजपा नेता एवं डी सी एफ अध्यक्ष सुरेंद्र अग्रहरि ने कही।उन्होंने बताया कि सूबे के मुख्यमंत्री को भी पत्र लिखेंगे।
उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश व झारखण्ड में जंगलो का कटान नही होता हैं।आदिवासी समाज उसकी रक्षा करता है क्योंकि वही लघुवनोपज उसकी आजीविका का साधन है। इससे पर्यावरण संरक्षण भी होता है जबकि इसके विपरीत उत्तर प्रदेश में लघुवनोपज को कही पर भी बिक्री न किये जाने के कारण आदिवासी समाज के लोग या जंगलों के आसपास रहने वाले लोग बहुत कम मात्रा में लघुवनोपज को इकट्ठा करते हैं या इसको निकालने में रुचि नहीं रखते और अपनी आजीविका जंगलो को काटकर लकड़ी बेचकर पूरा करते हैं ।इसके लिए यह आवश्यक है कि छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश की तर्ज पर उत्तर प्रदेश में भी लघुवनोपज बेचने की छूट दी जाए या उन राज्यो के शासनादेश को लागू किया जाना आदिवासी समुदाय के हित में आवश्यक है।छत्तीसगढ़ व मध्यप्रदेश की तर्ज पर लघुवनोपज को कही पर भी विक्रय करने का अधिकार दिया जाये जिससे जंगलों का कटान भी रुक जाए।आदिवासी समाज के आजीविका का साधन भी मिल जाये और पर्यावरण संरक्षण भी हो सके।

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