‘ग्रहण’ की समीक्षा, लेखक सत्य व्यास की किताब ‘चौरासी’ से हैं प्रेरित

‘ग्रहण’ की कहानी दो कहानियों का समावेश है, जो एक सच से आपस में जुड़ी हुई हैं और सीरीज में दोनों कहानियां एक साथ आगे बढ़ती हैं। सीरीज में पवन मल्होत्रा और ज़ोया हुसैन (अमृता और गुरसेवक) आज के समय के पिता- पुत्री के रूप में एक साथ आ रहे हैं, जबकि अंशुमान पुष्कर और वामिका गब्बी (ऋषि और मनु) इस सीरीज में 80 के दशक के रोमांस को पुनर्जीवित कर रहे हैं। कहानी शुरू होती है, जब एक युवा आईपीएस अधिकारी अमृता सिंह को एक विशेष तहकीकात सौंपी जाती है, जिसमें उसे पता चलता है कि इस मामले में केंद्रीय भूमिका उसके पिता गुरसेवक की थी। जैसे- जैसे जांच आगे बढ़ती है, प्याज की परतों की तरह नए- नए राज सामने आते हैं। पुलिस की इस जांच पर राजनीतिक रोटियां सेंकने की तैयारी भी अच्छे से देखने को मिलती है। वैसे तो हर सीरीज या फिल्म का आखिरी हिस्सा अपने आप में महत्वपूर्ण होता है, लेकिन इस सीरीज का आखिरी एपिसोड वाकई रोमांचकारी है।

‘ग्रहण’ की कहानी दो कहानियों का समावेश है, जो एक सच से आपस में जुड़ी हुई हैं और सीरीज में दोनों कहानियां एक साथ आगे बढ़ती हैं। सीरीज में पवन मल्होत्रा और ज़ोया हुसैन (अमृता और गुरसेवक) आज के समय के पिता- पुत्री के रूप में एक साथ आ रहे हैं, जबकि अंशुमान पुष्कर और वामिका गब्बी (ऋषि और मनु) इस सीरीज में 80 के दशक के रोमांस को पुनर्जीवित कर रहे हैं। कहानी शुरू होती है, जब एक युवा आईपीएस अधिकारी अमृता सिंह को एक विशेष तहकीकात सौंपी जाती है, जिसमें उसे पता चलता है कि इस मामले में केंद्रीय भूमिका उसके पिता गुरसेवक की थी। जैसे- जैसे जांच आगे बढ़ती है, प्याज की परतों की तरह नए- नए राज सामने आते हैं। पुलिस की इस जांच पर राजनीतिक रोटियां सेंकने की तैयारी भी अच्छे से देखने को मिलती है। वैसे तो हर सीरीज या फिल्म का आखिरी हिस्सा अपने आप में महत्वपूर्ण होता है, लेकिन इस सीरीज का आखिरी एपिसोड वाकई रोमांचकारी है।

कैसा है निर्देशन और सितारों का अभिनय:
रंजन चंदेल का निर्देशन बढ़िया है और सीरीज की छोटी- छोटी चीजों पर भी काफी ध्यान दिया गया है। सीरीज की एक बात और जो इसे खास बनाती है वो ये कि इसे जबरदस्ती लंबा करने की कोशिश नहीं की गई है, यानी आपको इसे देखते वक्त ये नहीं लगेगा कि इस हिस्से या पोर्शन की क्या जरूरत थी? वहीं दूसरी ओर बात किरदारों की करें तो पवन मल्होत्रा, ज़ोया हुसैन, अंशुमान पुष्कर और वामिका गब्बी सहित हर एक एक्टर ने अपने किरदार से साथ पूरा न्याय किया है। वामिका की मासूमियत और अंशुमान का स्टाइल देखकर जहां आपको किरदार से प्यार हो जाएगा तो वहीं जोया हुसैन पुलिस अधिकारी के रूप में पूरी तरह से जचती हैं। इसके साथ ही पवन मल्होत्रा ने कम डायलॉग्स के बाद भी सिर्फ हाव- भाव से ही अपना सिक्का एक बार फिर जमा दिया है।

क्या कुछ है खास सीरीज में:
ये सीरीज एक बेहद संवेदनशील मामले से जुड़ी है, और इससे जुड़ी कई खबरें भी हाल फिलहाल में सामने आईं, जहां एक धर्म विशेष इसके प्रसारण को बैन करने की मांग कर रहा है। ऐसे में ये बेशक मुमकिन है कि उनके इस सीरीज को देखने के नजरिए में और एक आम दर्शक के नजरिए में बहुत बड़ा फर्क हो। इस सीरीज को देखने के पहले ऑथेंटिक सोर्स से साल 1984 के घटनाक्रमों और ऑपरेशन ब्लू स्टार के बारे में पढ़ लें, ताकि आपको शुरुआत में ग्रहण से कटाव महसूस न हो। वैसे ये सीरीज पूर्ण रूप से ‘चौरासी’ के घटनाक्रमों को नहीं बल्कि उसमें छिपी एक प्रेम कहानी दिखाती है, हालांकि सीरीज की शुरुआत में ही डिसक्लेमर में कह दिया गया है कि ये फिक्शनल है।

सीरीज बेहतरीन हैं डायलॉग्स:
सीरीज के कुछ डायलॉग्स काफी बेहतरीन हैं, जैसे:
हमला करने वाला दंगाई होता है, हिन्दु या मुस्लिम नहीं।
राजनीति में कुछ बदलता नहीं है, टलता है और माहौल देखकर इतिहास अपने आप को दोहराता है।
राजनीति किसी के तरीके से नहीं चलती, उसकी अपनी चाल होती है।
हम अक्सर दुनिया में चीजों को काले और सफेद में देखते हैं, पर सच उसके बीच का रंग होता है।

‘चौरासी’ पढ़ी है !
ग्रहण, लेखक सत्य व्यास की किताब ‘चौरासी’ से प्रेरित है, लेकिन पूरी तरह से उस पर आधारित नहीं है। इस सीरीज और किताब के प्रमुख किरदार जरूर एक से हैं, लेकिन सीरीज में आपको क्रिएटिव लिबर्टी देखने को मिलेगी। हालांकि हो सकता है कि जिन पाठकों ने किताब पढ़कर इन किरदारों की जो खुद से रचना की थी, उससे ये किरदार अलग पाएं, तो ऐसे में कुछ को ये पसंद आएंगे और कुछ को नहीं। जार पिक्चर्स द्वारा निर्मित ग्रहण का निर्देशन रंजन चंदेल ने किया है तथा इसके शो रनर शैलेंद्र झा हैं। सीरीज में कुल 8 एपिसोड हैं, जो करीब 40-50 मिनट के हैं।

देखें या नहीं:
सीरीज में एक डायलॉग है- ‘ग्रहण अंधेरे के साथ रोशनी भी लेकर आता है, बदलाव का इशारा है’, ये डायलॉग सीरीज पर भी सटीक बैठता है। बीते कुछ वक्त से ओटीटी पर जो भी कंटेंट देखने को मिल रहा है, उससे काफी अलग है ग्रहण, एक ही जैसे कंटेंट से आगे बढ़ते हुए ये बदलाव का इशारा है, ऐसे में इस सीरीज को देखना चाहिए। वहीं अगर आपने ‘चौरासी’ पढ़ी भी है तो भी इस सीरीज को आप उससे अलग पाओगे।

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