पांचवें गुरु श्री अर्जुन देव जी शहीदों के हैं सरताज एवं शांतिपुंज

पांचवें गुरु श्री अर्जुन देव जी शहीदों के सरताज एवं शांतिपुंज हैं। आध्यात्मिक जगत में गुरु जी को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। उन्हें ब्रह्मज्ञानी कहा जाता है। गुरु श्री अर्जुन देव जी की निर्मल प्रवृत्ति, सहृदयता, धार्मिक एवं मानवीय मूल्यों के प्रति समर्पण देखते हुए गुरु रामदासजी ने 1581 में उन्हें पांचवें गुरु के रूप में गुरु गद्दी पर सुशोभित किया। श्री गुरुग्रंथ साहिब में तीस रागों में गुरु जी की वाणी संकलित है। गुरुजी ने स्वयं उच्चारित 30 रागों में 2218 शबदों को श्री गुरुग्रंथ साहिब में दर्ज किया है।

श्री गुरुग्रंथ साहिब का संपादन गुरु श्री अर्जुन देव जी ने भाई गुरदास की सहायता से 1604 में किया। गुरुजी शांत और गंभीर स्वभाव के स्वामी थे। उनके मन में सभी धर्मों के प्रति अथाह स्नेह था। मानव-कल्याण के लिए उन्होंने आजीवन कार्य किए। गुरु श्री अर्जुन देव जी ने सिख संस्कृति को घर-घर तक पहुंचाने के लिए अथाह प्रयत्‍‌न किए। सुखमनी साहिब उनकी अमर-वाणी है। आध्यात्मिक जगत में गुरु जी को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। गुरु श्री अर्जुन देव जी को शहीदों का सरताज कहा जाता है। उन्हें ब्रह्मज्ञानी कहा जाता है। गुरु जी ने संदेश दिया कि जीवन मूल्यों के लिए आत्म बलिदान देने को सदैव तैयार रहना चाहिए। अकबर की मौत के बाद उसका पुत्र जहांगीर बादशाह बना। वह गुरु जी की बढ़ती लोकप्रियता को पसंद नहीं करता था। उसने 1606 ई. में भीषण गर्मी के दौरान लोहे के गर्म तवे पर बैठाकर गुरु जी के शीश पर गर्म रेत डाली। गुरुजी के सारे शरीर पर फफोले निकल आए और ऐसी अवस्था में गुरुजी को लोहे की जंजीरों में बांधकर रावी नदी में फिंकवा दिया गया। गुरुजी का मात्र 43 वर्ष का जीवनकाल अत्यंत प्रेरणादायी रहा। सती प्रथा जैसी सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ भी वह डटकर खड़े रहे।

अपने शहर के एप को डाउनलोड करने के लिए क्लिक करे |  हमें फेसबुक,  ट्विटर,  और यूट्यूब पर फॉलो करें|
loading...
Back to top button
error: Content is protected !!