इस व्रत के प्रभाव से मिट जाते हैं जाने-अनजाने में हुए समस्त पाप

ज्येष्ठ मास की एकादशी के दिन ही भगवान शिवशंकर के बालों से मां भद्रकाली प्रकट हुईं। मां भद्रकाली के प्रकाट्य का मुख्य कारण पृथ्वी से राक्षसों का संहार करना था। इसी कारण इस दिन को भद्रकाली एकादशी कहा जाता है। इस पावन व्रत को लेकर मान्यता है कि जाने-अंजाने में कोई पाप हुआ है तो इस व्रत के प्रभाव से इससे मुक्ति प्राप्त होती है। भद्रकाली एकादशी को जलक्रीड़ा एकादशी नाम से भी जाना जाता है। उड़ीसा में इस दिन को जलक्रीड़ा एकादशी के रूप में मनाया जाता है।

इस एकादशी पर उपवास कर भगवान श्रीहरि विष्णु की आराधना करने से समस्त पापों से मुक्ति प्राप्त होती है। इस व्रत के प्रभाव से कभी प्रेत बाधा परेशान नहीं करती। घर में धन-धान्य की कमी नहीं रहती है। इस व्रत में भगवान श्रीहरि विष्णु के वामन अवतार की पूजा का विधान है। इस व्रत में चावल या इससे बने खाद्य पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए और न ही तुलसी पत्र तोड़ना चाहिए। इस व्रत में मन की सात्विकता का विशेष ध्यान रखा जाता है। इस व्रत में विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें। एकादशी की रात्रि में भगवान श्री हरि विष्णु का जागरण करें। इस व्रत में सत्संग में समय व्यतीत करें। द्वादशी के दिन अन्न दान बहुत शुभ माना जाता है। द्वादशी के दिन सुबह ब्राह्मणों को अन्न व दक्षिणा देकर व्रत को संपन्न करें।

नोट:
इस आलेख में दी गई जानकारियां धार्मिक आस्थाओं और लौकिक मान्यताओं पर आधारित हैं, जिसे मात्र सामान्य जनरुचि को ध्यान में रखकर प्रस्तुत किया गया है।



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