पितामह भीष्म को समर्पित हैं भीष्म अष्टमी का व्रत, सभी पापों को करता हैं दूर, जानें

माघ मास में शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को पितामह भीष्म ने अपना शरीर त्यागने के लिए चुना था। इस दिन को भीष्म अष्टमी के रूप में जाना जाता है। यह तिथि पितामह भीष्म की पुण्यतिथि है। पितामह भीष्म को इच्छा मृत्यु का वरदान प्राप्त था। माघ शुक्ल अष्टमी को उन्होंने मृत्यु के लिए इसलिए चुना कि इस समय सूर्यदेव उत्तर दिशा या उत्तरायण में आने लगते हैं। भगवान सूर्यदेव दक्षिण दिशा में छह माह के लिए चले जाते हैं। इस दौरान कोई भी शुभ कार्य नहीं किया जाता है। जब तक सूर्यदेव उत्तर दिशा में वापस नहीं जाने लगते तब तक हर शुभ कार्य को स्थगित कर दिया जाता है।

पितामह भीष्म को समर्पित भीष्म अष्टमी का व्रत सभी पापों को दूर करता है। साथ ही पितृ दोष से भी मुक्ति प्रदान करता है। महाभारत युद्ध में घायल होने के बावजूद पितामह भीष्म 18 दिनों तक शैय्या पर लेटे रहे। उन्होंने माघ शुक्ल अष्टमी तिथि को चुना और मोक्ष प्राप्त किया। इस दिन दान-पुण्य का विशेष महत्व है। भीष्म अष्टमी के दिन जल, कुश और तिल से पितामह भीष्म का तर्पण किया जाता है। ऐसा करने से वीर एवं योग्य संतान की प्राप्ति होती है। इस दिन जरूरतमंदों को दान देते हुए पितरों का स्मरण करना चाहिए। इस दिन पितामह भीष्म के निमित्त तिलों के साथ तर्पण तथा श्राद्ध करने वाले व्यक्ति को सुख-समृद्धि का आशीष प्राप्त होता है।

नोट:
इस आलेख में दी गई जानकारियां धार्मिक आस्थाओं और लौकिक मान्यताओं पर आधारित हैं, जिसे मात्र सामान्य जनरुचि को ध्यान में रखकर प्रस्तुत किया गया है।



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