संकष्टी गणेश चतुर्थी व्रत के प्रभाव से संतान पर आने वाली बाधाएं हो जाती हैं दूर

भगवान श्रीगणेश जी बुद्धि के दाता हैं। माघ मास की चतुर्थी तिथि को भगवान श्रीगणेश को समर्पित संकष्टी गणेश चतुर्थी, सकट चौथ व्रत रखा जाता है। इस दिन माताएं अपनी संतान के लिए व्रत रखती हैं। संतान प्राप्ति और संतान की दीर्घायु के लिए यह व्रत बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। इस व्रत के प्रभाव से संतान पर आने वाली बाधाएं दूर हो जाती हैं।

इस व्रत का महत्व भगवान श्रीगणेश ने मां पार्वती को बताया था। इस व्रत की विशेषता है कि घर का कोई भी सदस्य इस उपवास को कर सकता है। यह भी मान्यता है कि भगवान श्रीगणेश ने इस दिन भगवान शिवशंकर, माता पार्वती की परिक्रमा की थी। इस व्रत में तिल का इस्तेमाल होने के कारण यह तिल चतुर्थी भी कहा जाता है। इस व्रत में पानी में तिल डालकर स्नान किया जाता है। इस दिन भगवान श्रीगणेश जी की पूजा कर भगवान को भोग लगाकर कथा सुनी जाती है। 21 दूर्वा भगवान श्रीगणेश जी को अर्पित करनी चाहिए। ऐसा करने से स्वास्थ्य लाभ प्राप्त होता है। इस व्रत में तिल और गुड़ से बने लड्डू, ईख, शकरकंद, गुड़, घी अर्पित करने की परंपरा है। शाम को चंद्रमा को अर्घ्य देकर ही व्रत संपन्न होता है। सकट चौथ के दिन भगवान श्रीगणेश जी के साथ चंद्रदेव की पूजा की जाती है। शहद, रोली, चंदन और रोली मिश्रित दूध से अर्घ्य देना चाहिए। इस दिन व्रतधारी को लाल रंग के वस्त्र धारण करना चाहिए। इस दिन सामर्थ्य के अनुसार जरूरतमंदों को दान अवश्य दें।

नोट:
इस आलेख में दी गई जानकारियां धार्मिक आस्थाओं और लौकिक मान्यताओं पर आधारित हैं, जिसे मात्र सामान्य जनरुचि को ध्यान में रखकर प्रस्तुत किया गया है।



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