इस बेहद खास योग में माताएं मनाएंगी माँ अहोई अष्टमी का व्रत, जानें

अपने पुत्र संतान की लंबी आयु एवं सुख-समृद्धि के लिए आठ नवंबर 2020 दिन यानी रविवार को माताएं मां अहोई अष्टमी का व्रत रखेंगी। ज्योतिषाचार्य पं.शिवकुमार शर्मा के अनुसार अहोई का अर्थ होता है अनहोनी को टालने वाली माता। यह व्रत निर्जला व्रत की तरह होता है क्योंकि इसमें माताएं फलाहार भी नहीं करती। ऐसा कहा जाता है कि फल पुत्र संतान के प्रतीक होते हैं इसलिए माताएं इस दिन दूध पीना एवं फल खाना वर्जित मानती हैं। इसलिए निराहार एवं निर्जला व्रत माताएं अपने पुत्र की खुशी के लिए करती हैं। शाम को तारा उदय होने पर इस व्रत का समापन होता है। तारा देख उसको अर्घ्य देकर माताएं अपना व्रत का समापन करती हैं। पं.शिवकुमार शर्मा के अनुसार माना जाता है कि चंद्रमा पति कारक और तारे पुत्र कारक होते हैं ।
मां अहोई अष्टमी का पर्व प्रातः रवि पुष्य योग से आरंभ होगा और पूरे दिन सौम्य योग के साथ मनाया जाएगा। रविवार को सूर्यास्त शाम को 5:28 बजे होगा और उसके आधे घंटे बाद आकाश में तारे दिखने आरंभ हो जाएंगे। उनका दर्शन कर माताएं जल का अर्घ्य देती हैं।

शाम के समय माताएं दीवारों पर गेरू एवं खड़िया से अहोई माता का चित्र बनाती हैं या बने बनाएं चित्र की विधि-विधान से पूजा करती हैं। सिंघाड़ा, मूली अथवा कोई फल रखकर पूजा की जाती है। घर की बड़ी महिलाएं मांअहोई अष्टमी की कथा सुनाती हैं। इसके पश्चात पकवान बनाकर घर की बड़ी महिलाओं,ननद या बुजुर्गों को बायना (भेंट) भोजन, वस्त्र आदि दिया जाता है। माताएं अपने पुत्रों की दीर्घायु के लिए ईश्वर से और मां अहोई से प्रार्थना करती हैं। पूजा करने के बाद घर के बड़े सदस्यों के चरण स्पर्श करके आशीर्वाद लेती हैं।

नोट:
(ये जानकारियां धार्मिक आस्थाओं और लौकिक मान्यताओं पर आधारित हैं, जिसे मात्र सामान्य जनरुचि को ध्यान में रखकर प्रस्तुत किया गया है।)



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