भगवान शिवशंकर उपासना का उत्तम मास है अधिमास, जानें

अधिमास होने के कारण इस साल चतुर्मास चार महीने के बजाय पांच महीने का हो गया। इस पंचमास को ईश्वरीय ज्ञान, ध्यान, योग आदि की साधना के लिए अति शुभ और फल प्रदायक माना गया है हर तीन वर्ष में ‘चतुर्मास’ को ‘पंचमास’ बनाने वाले अधिमास का महत्व इसकी आध्यात्मिक महत्ता में ही निहित है। शास्त्र की दृष्टि से देखा जाए, चतुर्मास सृष्टि चक्र के चार युग सतयुग, त्रेतायुग, द्वापर व कलयुग का प्रतीक है। कल्प के इन चार युगों के अंत में एक छोटा-सा युग भी जुड़ जाता है, जिसको कल्याणकारी ‘पुरुषोत्तम संगम युग’ कहा जाता है, जो आत्माओं को उनके परमपिता परमात्मा शिवशंकर से संगम कराने का भी श्रेष्ठ युग है। आध्यात्मिक दृष्टि से देखें, इस छोटे-से, लेकिन सर्वाधिक पुण्य प्रदायक पांचवें मास में ही मनुष्य परमात्मा के आध्यात्मिक ज्ञान, योग, ध्यान, सेवा, संयम, नियमों का अभ्यास और साधना करके ही सामान्य पुरुष से पुरुषोत्तम बन जाने की अनुकूल उपाय, परिवेश और प्रेरणा प्राप्त करता है।

धार्मिक मान्यता के अनुसार, आषाढ़ शुक्ल एकादशी से लेकर कार्तिक शुक्ल एकादशी तक के चार मास को चतुर्मास के रूप में मनाया जाता है, जिसमें खासकर भगवान शिवशंकर, चतुर्भुज श्रीहरि विष्णु, श्री गणेश, मां लक्ष्मी तथा अन्य देवी-देवताओं की पूजा, आवाहन, उपवास, जप आदि किया जाता है। पुराणों में कहा गया है कि इन चार महीनों में भगवान श्रीहरि विष्णु क्षीर सागर में विश्राम करते हैं और सृष्टि के पालन व संचालन का कार्यभार स्वयं भगवान शिवशंकर के ऊपर होता है। इस पूरे समय में मुख्यत: परमात्मा शिवशंकर की ही उपासना की जाती है।

इस पुरुषोत्तम वेला में, सृष्टि रूपी कल्पवृक्ष के रचयिता, दिव्य ज्योति स्वरूप निराकार शिव परमात्मा का अवतरण होता है, जिनके दिव्य दर्शन व पावन स्मृति से हर मानव में सोए हुए देवत्व का उत्थान होता है और मनुष्य की अंतरआत्मा में मौजूद विकर्म, विकार एवं आसुरी स्वभाव का विनाश होता है। शिव से प्राप्त सतज्ञान को अपनाकर ही हम अपने जीवन और संसार में संपूर्ण सुख-शांति, समृद्धि, दैवी सम्पदा आदि की पुन: स्थापना कर सकते हैं।
इस मास में सर्वेश्वर शिव के लिए किए गए योग तपस्या, दान, पुण्य और सुकर्म मनुष्य को विष्णुलोक या देवलोक में पुरुषोत्तम पद दिला सकते हैं। मान्यता है कि इस मास में, अगर भक्त साधारण पुरुष से उत्तम पुरुष बनने के लिए आध्यात्मिक ज्ञान को प्राप्त कर लें, तो वे ईश्वर के साथ योगयुक्त रह कर शुद्ध और सात्विक आहार, विहार, अचार, विचार एवं कर्म व्यवहार कर पाते हैं। उनमें दैवी गुण विकसित होने लगते हैं।

पुराणों में कहा गया है कि इन चार महीनों में भगवान श्रीहरि विष्णु विश्राम करते हैं और सृष्टि के पालन व संचालन का कार्यभार भगवान शिवशंकर के ऊपर होता है। इस पूरे समय में मुख्यत: भगवान शिवशंकर जी की ही उपासना की जाती है।



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