योगिनी एकादशी पावन व्रत तीनों लोक में हैं प्रसिद्ध,जानें क्या है महत्व

आषाढ़ मास में कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी को योगिनी एकादशी कहा जाता है। यह व्रत तीनों लोक में प्रसिद्ध है। मान्यता है कि 88 हजार ब्राह्मणों को भोजन कराने के पश्चात जितना पुण्य प्राप्त होता है उसके समान पुण्य की प्राप्ति इस व्रत को रखने से होती है। इस व्रत के प्रभाव से हर प्रकार के चर्म रोग से मुक्ति मिलती है। इस व्रत में भूखे को अन्न और प्यासे को जल अवश्य पिलाना चाहिए।

योगिनी एकादशी उपवास की शुरुआत दशमी तिथि की रात्रि से हो जाती है। व्रती को दशमी तिथि की रात्रि में सात्विक भोजन ग्रहण करना चाहिए। ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। जमीन पर ही शयन करना चाहिए। इस व्रत में दान करना कल्याणकारी है। पीपल की पूजा भी इस दिन अवश्य करें। रात्रि में जागरण कर श्री हरि विष्णु का कीर्तन करें। इस व्रत में दुर्व्यसनों से दूर रहें। जो लोग यह व्रत नहीं रख सकते उन्हें भोजन में चावल का प्रयोग नहीं करना चाहिए। झूठ एवं परनिंदा से बचना चाहिए। इस व्रत में विष्णु सहस्रनाम का पाठ करने से श्री हरि विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है। इस व्रत में अपना मन शांत रखें। क्रोध न करें। द्वादशी तिथि को ब्राह्मणों को भोजन कराने के बाद स्वयं भोजन करें।

नोट:
इस आलेख में दी गई जानकारियां धार्मिक आस्थाओं और लौकिक मान्यताओं पर आधारित हैं, जिसे मात्र सामान्य जनरुचि को ध्यान में रखकर प्रस्तुत किया गया है।


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