सादगी एवं सोशल डिस्टेंसिंग के साथ पढ़ी गई ईद की नमाज

धर्मेन्द्र गुप्ता (संवाददाता)

विंढमगंज । आज रमजान माह बीतने के बाद रांची-रीवा राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित जामा मस्जिद में ईद की नमाज बहुत ही सादगी तरीके से अंजुमन इस्लामिया कमेटी के सदर सुहेल खान व पुलिस बल के मौजूदगी में मौलाना रुस्तम के द्वारा पढ़ाया गया। इस दौरान थानाध्यक्ष प्रदीप कुमार सिंह इलाके में भ्रमण करते रहे। वहीं सलैयाडीह जामा मस्जिद पर थाने के एस आई संजीव राय अपने पुलिस बल के साथ डटे रहे।

अंजुमन इस्लामिया कमेटी के सदर सुहेल खान उर्फ नन्हे ने बताया कि बीते रविवार की शाम ईद के चांद का दीदार होते ही लोग एक-दूसरे को मुबारकबाद देने का सिलसिला शुरू हो गया जो कि ख़ुशी के इज़हार का इंसानी तरीका है। लेकिन इस साल के तरीकों और संसाधनों में व्यापक बदलाव देखने को मिल रहा है। कोरोना ने न तो किसी को गले ही मिलने दिया और न ही मुसाफा (हाथ मिलाना) ही करने दिया।

लोग शोसल डिस्टेंसिंग का ख्याल रखते हुए एक दूसरे को दूर से ही चाँद मुबारक का जुमला पेश करने पर मजबूर कर दिया है। इसके अलावा व्हाट्सएप, फेसबुक, इंस्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया का जमकर उपयोग करते हुए एक दूसरे को चांद मुबारक का मैसेज भेज रहे है। कॅरोना की वजह से चूंकि नमाज घर पर पढ़ना है इसलिए नमाज नफ़्ल (चाश्त) अदा की जाएगी। इसके लिए नीयत मैं करता हूँ 2 रकात नमाजे नफ़्ल (चाश्त) की वास्ते अल्लाह तआला के मुंह मेरा काबा शरीफ की तरफ अल्लाहो अकबर। दो रकात के बाद दुआ मंगाकर फिर दो रकात उसी तरह नीयत बांधकर नमाज अदा की जाएगी। नमाज खत्म होने के बाद “अल्लाहो अकबर, अल्लाहो अकबर”, “लाइलाह इल्लल्लाह, वल्लाहो अकबर, अल्लाहो अकबर वलिल्लाहिल हम्द” 34 बार पढ़कर दुआ मांगेंगे। ईद के बाद 6 रोजे रखना जिसे शसईद कहा जाता है, मुस्तहब और बड़े सवाब का काम है। ईद की 2 तारीख से 7 तारीख तक इन रोजों को रखना चाहिए।

इसे औरतों का खास रोजा समझना नादानी है। अल्लाह के रसूल का फरमान है जिसने रमजान के बाद 6 रोजे रखे हो, गोया उसने पूरे साल रोजा रखा।

हर मालदार आदमी से फर्ज है जकात।
सलैयाडीह ग्राम पंचायत में स्थित जामा मस्जिद के मौलाना रुस्तम ने बताया कि गरीबों की मदद करने व जरूरतों की जरूरतें पूरी करने के लिए अल्लाह पाक ने अपने मालदार खुशहाल बंदों पर जकात व सदक-ए-फित्र वाजिब फरमाया है। सदक-ए-फित्र जब वाजिब हुआ तो ताजदार ए मदीना सल्लल्लाहो सल्लम ने एक सहाबी से फरमाया कि शहर की गलियों में जाकर ऐलान कर दो कि सदकए फित्र अदा करना वाजिब हो चुका है। हर मुसलमान बालिग औरत व मर्द पर जो साहिबे निसाब (मालदार) हो उन पर अपनी और अपने नाबालिक औलाद की तरफ से फितरा अदा करना जरूरी है। मुस्तहब तो यह है कि ईद की सुबह नमाज से पहले पहले फितरा अदा कर दिया जाए। इसके अलावा उससे पहले रमजान के महीने में भी अदा किया जा सकता है। लेकिन ईद की नमाज के बाद अदा करना गुनाह है। क्योंकि जिस मकसद के लिए अल्लाह पाक ने इसे वाजीब फरमाया है वह करीब-करीब खत्म हो जाता है। फिर भी अगर किसी वजह से नमाज से पहले अदा ना कर सके तो नमाज के बाद भी अदा करना जरूरी है। जैसे कि वक्त पर नमाज अदा करना जरूरी है। अगर वक्त निकल जाए तो भी फितरा अदा करना वाजीब है। हदीस शरीफ में है जिसने फितरा नहीं दिया उसके रोजे व नमाजें जमीन और आसमान के बीच लटकती रहती हैं। फितरा से जहां एक तरफ हमारे दिन भाइयों की जरूरतें पूरी होती हैं तो वहीं दूसरी तरफ हमारी बातें बारगाह ए इलाही में मकबूल होती हैं और हमें दुनिया की बेसुमार भलाइयां नसीब होती है। 2 किलो 47 ग्राम गेहूं या उसकी कीमत रुपया 40 मात्र फितरा के तौर पर अदा करना, किसी जरूरतमंद दीनी भाई-बहन की मदद करना वाजिब है। चाहे तो एक फितरा एक आदमी को दे दें या कई आदमियों को दें। माने कि फितरा की रकम ₹40 हुई तो ₹10 करके चार आदमी को भी दे सकते हैं।


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