दुख,दर्द व दुर्दशा का शिकार हो रहे मजदूर

* प्रवासी मजदूरों का पलायन तेज।

* बड़े शहरों से गौवों की ओर पलायन
सामाजिक दूरी ने तोड़ी सपनों की मंजिल।

मनोहर कुमार (वरिष्ठ संवाददाता)



चन्दौली। कोरोना वायरस के संक्रमण काल में मजदूर विवशता का केंद्र बन गए।सबसे बड़ी आफत इन्हीं पर गिर रही है।विभिन्न राज्यों से अपने घरों को वापसी के लिए जद्दोजहद करनी पड़ रही है। माँ बेटे का पति पत्नी का तो दोस्त दोस्त का साथ छोडने को तैयार नहीं।बेबसी का आलम यह है कि भय व भूख के साये में केवल घर वापस लौटने की जिद है।इस समय मजदूर दुख दर्द व दुर्दशा का शिकार हो रहे।उनका कोई पुरसाहाल नहीं है।
कोरोना वायरस के संक्रमण से विश्व के अधिकांश देश कराह रहे है।कातिल कोरोना ने गजब का सितम ढा रहे है। भारत मे कोरोना संक्रमितों की संख्या मंगलवार को एक लाख के ऊपर हो गई।जिसमें कुछ उपचार के बाद ठीक भी हो रहे है। इस समय देश लॉक डाउन फेज फोर चल रहा है। लॉक डाउन में सबसे ज्यादा बेबस मजदूर हैं।कहा जाए तो कोरोना संक्रमण से कम अपनी जिंदगी के भय स्व मजदूरों में हाहाकार मचा है। हर हाइवे पर मजदूर अपनी घर वापसी के लिए जा रहे हैं।पैदल ही वापस जा रहे हैं।ट्रेन से वापसी के लिए पंजीकरण कराने के लिए भीड़ उमड़ रही है।
नजारा यूपी के चंदौली भी देखा जा सकता है ।जहां एनएच 2 पर प्रवासी श्रमिकों का काफिला दिन रात देखने को मिल रहा है।दरअसल यह एनएच 2 यूपी को बिहार, झारखंड व पश्चिम बंगाल से जोड़ता है। जिसकी वजह से इस रास्ते से श्रमिकों के गुजरने का सिलसिला जारी है। दिल्ली, मुंबई, चेन्नई जैसे बड़े महानगरों से लौट रहे प्रवासी श्रमिकों के बदहाली का नजारा यहां खुलेआम दिख रहा है। यह वही श्रमिक है जो अपने गांव शहर को छोड़कर महानगरों में नौकरी की तलाश में निकले थे और पेट पालने के लिए कहीं ना कहीं नौकरी कर रहे थे।लेकिन आज लॉक डाउन के चलते आलम यह है कि यह मजदूर बिल्कुल बेबस और मजबूर है।जो अपनी नौकरी तो गवा चुके लेकिन अपने घर पहुंचने के लिए कहीं ट्रक पर तो कहीं साइकिल पर और कही कहीं पैदल सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा करने को विवश हैं।सरकार प्रवासी मजदूरों के लिए बसों और ट्रेनों को चलाने का लाख दावा कर रही हो लेकिन जमीनी हकीकत बिल्कुल अलग है।नेशनल हाईवे पर महिलाए,ं बुजुर्ग बच्चे भूख प्यास से बेहाल पैदल जाते हुए दिख रहे हैं तो वहीं कुछ किराए की ट्रकों पर लटक कर हजारों किलोमीटर लंबी यात्रा कर रहे हैं।मजदूरों की दुश्वारियां यही नहीं खत्म होती। मजदूर इस समय दुख,दर्द व दुर्दशा का शिकार हो रहे हैं।पलायन इस तरह हावी है कि वह किसी भी तरह से अपने घर वापस जाना चाहते हैं। सपनों की दुनिया बनाने महानगरों को निकले मजदूर सोशल दूरी के लिए घर जा रहे हैं।


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