बरुथनी एकादशी के व्रत से समस्त पापों से मिलती मुक्ति

एकादशी व्रत सभी व्रतों में श्रेष्ठ माना जाता है। इस व्रत से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। बैशाख माह में कृष्ण पक्ष की एकादशी को बरुथनी एकादशी व्रत किया जाता है। इस एकादशी व्रत में भगवान श्रीहरि विष्णु के वराह रूप की आराधना की जाती है। बरुथनी एकादशी के व्रत से समस्त पापों से मुक्ति मिलती है।

कहा जाता है कि इस एकादशी पर अगर व्रत नहीं भी रखा है तो कुछ नियमों का सभी को पालन करना चाहिए। इस दिन चावल का सेवन बिल्कुल न करें। इस दिन बैंगन का सेवन अशुभ माना जाता है। लहसुन और प्याज का सेवन हर शुभ दिन वर्जित होता है। इस व्रत में सिर्फ फलाहार ले सकते हैं। अन्न ग्रहण करना वर्जित है। जो जमीन को बिना जोते उपलब्ध हो जाते हैं उन्हें ग्रहण किया जा सकता है। इस दिन कांसे के बर्तन में भोजन न करें। भूमि पर शयन करें। इस व्रत में किसी की निंदा न करें। न क्रोध करें और न ही झूठ बोलें। वरुथिनी एकादशी के दिन नमक, तेल का सेवन भी वर्जित है। एकादशी के दिन सुबह उठकर भगवान श्रीहरि विष्‍णु का स्‍मरण करें। शाम के समय कथा सुनने के बाद फलाहार करें। रात्रि के समय जागरण करते हुए भजन-कीर्तन करें। प्रातः काल पति पत्नी संयुक्त रूप से भगवान श्री हरि विष्णु की उपासना करें। उन्हें पीले फल, पीले फूल, तुलसी दल और पंचामृत अर्पित करें। मान्यता है कि जो कोई एकादशी की व्रत कथा पढ़ता है, सुनता है या सुनाता है उसे मोक्ष की प्राप्‍ति होती है। एकादशी व्रत करने वालों को भोग-विलास से दूर रहना चाहिए। इस व्रत में वृक्ष से पत्ता तोड़ना भी वर्जित है। “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का जाप करें। एकादशी के दिन घर में झाड़ू नहीं लगाना चाहिए।

नोट:
इस आलेख में दी गई जानकारियां धार्मिक आस्थाओं और लौकिक मान्यताओं पर आधारित हैं, जिसे मात्र सामान्य जनरुचि को ध्यान में रखकर प्रस्तुत किया गया है।

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