बैरखड़ में मनाई गई परम्परागत होली, मानर की थाप पर जमकर झूमे आदिवासी

रमेश यादव (संवाददाता)

दुद्धी।भारत ही एक देश है जहां अनेक सभ्यता एवं संस्कृति के लोग रहते हैं सबकी शादी विवाह एवं त्यौहारों को मनाने का अलग – अलग अंदाज है ।संस्कृतियों का समुच्चय है भारत देश। इसमें विविधताओं के असंख्य स्वरूप हैं। उसके अपने मायने हैं। अपनी विशेषता है और खूबसूरती है। इसीलिए तो जनपद के आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र दुद्धी तहसील के कई ऐसे गांव है जहां पर होली मनाने की अलग और अति प्राचीन परंपरा है। इसके वर्तमान स्वरूप में अत्यंत प्राचीन काल की संस्कृति की झलक दिखाई पड़ रही है।इसी क्रम में दुद्धी ब्लॉक क्षेत्र के बैरखड़ गांव में शुक्रवार को आदिवासियों ने रंगों का त्यौहार होली मनाई और दिन भर रंगों से सराबोर होकर झूमते रहे । जिंदा होली मनाने की परम्परा को लेकर ग्राम प्रधान अमर सिंह गौड़ कहते हैं कि गांव में जिन्दा होली मनाने की परम्परा काफी पुरानी है ।गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि बहुत पहले एक बार गांव में भारी धन जन की क्षति हुई थी तब बुजुर्ग लोगो एवं धर्माचार्यों ने चार दिन पहले होली मनाने का सुझाव दिया था तभी से जिंदा होली मनाते चले आ रहे हैं इससे गांव में सुख समृद्धि बनी रहती हैं ।उसी तरह नगवां तथा मधुबन सहित अन्य स्थानों पर भी जिन्दा होली मनाने की परम्परा है।विंढमगंज थाना प्रभारी प्रदीप सिंह ने ग्राम प्रधान अमर सिंह के आवास पर जाकर होली सकुशल मनाने के लिए बधाई दी।

मानर की धुन पर जमकर थिरकते रहे आदिवासी –

ब्लॉक क्षेत्र के बैरखड़ में शुक्रवार को आदिवासियों द्वारा परम्परा के साथ जिंदा होली मनाई गई ।वहां मानर की थाप पर खेलने की परम्परा आज भी कायम है ।इन गांव में गोंड़ जनजाति निवास करती है। वैसे भी इस जनजाति का इतिहास प्राचीन काल तक जाता है। ये लोग समूह में इकट्ठा होकर एक-दूसरे को अबीर लगाते है और मानर नामक वाद्ययंत्र की धुन पर नृत्य करते हैं। इस नृत्य में महिलाएं भी शामिल रहती हैं। दिनभर चलने वाले इस कार्यक्रम में पुरुष वर्ग महुए से बनी कच्ची शराब का सेवन भी करते हैं।

नियत तिथि पर नहीं मनाते होली-

बैरखड़ के ग्राम प्रधान अमर सिंह गौड़ ,छोटेलाल सिंह ,देवीलाल व रामकिशुन बताते है कि किसी समय होली के दिन सभी आदिवासी लोग नशे में आनंदित थे। सभी लोग नाच-गा रहे थे, तभी किसी अनहोनी घटना में कई लोग एक साथ मर गए थे तब धर्माचार्यों ने होली मनाने की परंपरा नियत तिथि से पूर्व मनाने की हो चली जो अब तक जारी है।उन्होंने बताया कि होलिका दहन वैगा या अपनी ही बिरादरी के मनोनीत वैगा या पंडित लोगों से कराने की प्रथा है। इस स्थल को संवत डाड कहा जाता है।जहां होलिका दहन के अगले दिन होलिका दहन के अवशेष को उड़ाते हुए दिनभर होली खेलते हुए अपने ईष्ट देव की आराधना एवं पूजा पाठ करते हैं।

सुरक्षा के थे पुख्ता इंतजाम

विंढमगंज थाना क्षेत्र के बैरखड़ गांव में शुक्रवार को होली के दौरान सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए थे ।थाना प्रभारी प्रदीप सिंह मय फोर्स के साथ डटे रहे और अपनी कुशल नेतृत्व में होली एवं जुमे का नमाज अदा करवाया और अंत में ग्राम प्रधान अमर सिंह से परम्परागत होली पर शिष्टाचार मुलाकात कर शुभकामनाएं दी।


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