लट्ठमार होली भी कान्हा की प्रेमलीला का ही हैं एक प्रतीक रूप,जानें किसने किया था शुरू

लट्ठमार होली भी कान्हा की प्रेमलीला का ही एक प्रतीक रूप है। जिस तरह कान्हा, गोपियों को तंग करते थे और गोपियां खीझकर उन्हें दौड़ाती थीं, उसी तरह हुरियारों की ठिठोली पर हुरियारिनें उन्हें लाठियों से पीटती हैं।

दक्षिण भारत से आए नारायण भट्ट ने शुरू किया:
बताया जाता है कि करीब 550 वर्ष पूर्व दक्षिण भारत से आये नारायण भट्ट ने बरसाना-नन्दगांव की लट्ठमार होली का प्राकट्य कर शुरू कराया। ये फाल्गुन मास की नवमी को खेली जाती है।

कहां से प्रारंभ लट्ठमार:
लट्ठमार होली बरसाना की रंगीली गली में खेली जाती है। अब इसका विस्तार सात अन्य गलियों मेन बाजार, फूल गली ,सुदामा चौक, बाग मोहल्ला, कटारा पार्क भूमियां गली, होली टीला तक हो गया है। बरसाना की रंगीली गली के साथ मथुरा, वृंदावन, नंदगांव में भी परंपरागत लठमार होली खेली जाती है। नंदगांव के हुरियारे नंदबाबा मंदिर में आशीर्वाद के बाद पताका लेकर निकलते हैं। वहां से हुरियारे पीली पोखर पहुंचते हैं। साज-सज्जा और ढाल कसने के बाद रसिया गाते हैं। फिर लाड़िली जी मंदिर की ओर बढ़ जाते हैं। दर्शन के बाद वापसी में रंगीली गली में लट्ठमार होली खेली जाती है।

लट्ठमार होली क्यों?
राधारानी के गांव बरसाना के आमंत्रण पर कान्हा के नंदगांव के हुरियारे होली खेलने बरसाना पहुंचते हैं। यहां उनकी ठिठोली पर खीझ कर बरसाना की हुरियारिनें उन पर लाठियों से वार करती हैं और हुरियारे ढाल से बचते हैं। कहा जाता है कि श्रीकृष्ण अपने सखाओं के साथ बरसाना होली खेलने आते थे। होली की मस्ती में राधा अपनी सखियों के श्रीकृष्ण और उनके साथियों पर डंडे बरसाती थीं। तभी से बरसाना में लट्ठमार होली की परंपरा चली आ रही है।

कौन कौन होता शामिल:
लट्ठमार होली खेलने के लिए मूल रूप से दो गांव बरसाना और नंदगांव के लोग शामिल होते हैं। बरसाने के अगले दिन नंदगांव में लट्ठमार होली होती है। अब आसपास के गांव के लोग भी इसमें शामिल होने लगे हैं। बरसाना की लट्ठमार होली में नंदगांव के हुरियारे बरसाना में होली खेलने आते हैं। बरसाना की हुरियारिनें उन पर लाठियां बरसाती हैं और हुरियारे खुद को ढप से बचाते हैं और फाग गाकर आनंद उठाते हैं। इसी प्रकार अगले दिन नंदगांव में लट्ठमार होली होती है जिसमें नंदगांव की महिलाएं बरसाने के पुरुषों पर लाठियां बरसाती हैं।


कैसे होती लठमार होली:
करीब एक माह पहले से हुरियारिनें तैयारियों में जुट जाती हैं। हुरियारिनें जहां दूध, घी, मेवे और फल आदि खाकर अपनी सेहत बनाना शुरू कर देती हैं तो हुरियारे भी अपनी परंपरागत पोशाक और ढालों को दुरुस्त करने में जुट जाते हैं। नंदगांव से आने वाले हुरियारों पर प्रेम पगी लाठियां भांजने में कहीं कमजोर ना पड़ जाए इसलिए हुरियारिनें अपनी लाठियों को तेल भी पिलाती हैं। साथ ही हुरियारिनों के लठ्ठ की मार से खुद को ढाल से बचाने के गुर हुरियारे सीखते हैं।

कितने लोग होते शामिल:
बरसाना की लट्ठमार होली में जहां एक हजार से ज्यादा बरसाने की हुरियारिनें होती हैं तो करीब दो हजार से ज्यादा नंदगांव के हुरियारे लट्ठमार होली खेलने बरसाना पहुंचते हैं। इन अविस्मरणीय पलों के देश-विदेश से पहुंचने वाले करीब दस लाख श्रद्द्धालु साक्षी बनते हैं।

पारंपरिक परिधान:
हुरियारिनें पारंपरिक भारतीय परिधान लंहगा-ओढ़नी पहन कर होली खेलती हैं। सालभर घरों में सामान्य तरीके से रहने वाली बरसाना की गोपियां (हुरियारिनें) होली पर अपने हाथों में तेल से चमचमाती लाठी लिए सोलह श्रृंगार कर हुरियारों पर लठ्ठ बरसाती हैं तो असाधारण और आलौकिक तेज देखने को मिलता है।

नारी सशक्तीकरण की प्रतीक:
लट्ठमार होली केवल आनंद के लिए ही नहीं, बल्कि यह नारी सशक्तीकरण की प्रतीक भी मानी जाती है। बताते हैं कि श्रीकृष्ण महिलाओं का सम्मान करते थे और मुसीबत के समय में हमेशा उनकी मदद करते थे। लट्ठमार होली में श्रीकृष्ण के उसी संदेश को प्रद्दर्शित किया जाता है। थोड़े चुलबुले अंदाज में महिलाएं लट्ठमार होली में अपनी ताकत का प्रद्दर्शन करती हैं।


स्वादिष्ट व्यंजन:
होली के अवसर पर लोग घरों में स्वादिष्ट पकवान बनाते हैं। ब्रज में होली के मौके पर खासतौर पर गुझिया, मालपुआ, दही-बड़ा समेत तमाम खास व्यंजन घरों में बनाए जाते हैं। लोग नाचते गाते हैं और ढोल बजाकर होली के गीत गाते हैं।

दुश्मन भी मिलते गले:
होली पर पुरानी दुश्मनी को छोड़कर बैर भाव भूलकर दुश्मन को गले लगाने की भी परंपरा कही जाती है। ब्रज में ऐसा कई स्थानों पर होता है जब लोग सुबह एक दूसरे के घरों में जाकर पुरानी बातें भूलकर नए सिरे से रिश्तों को परवान चढ़ाते हैं।



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