आदिवासियों में आज भी जिन्दा है फूलों की बनी रंग से होली खेलने की परम्परा

रमेश यादव/धर्मेन्द्र गुप्ता (संवाददाता)

– आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों में आज भी प्राकृतिक रंगो से खेली जाती है होली

– पलास के फूलों (टिसू) को सुखाकर बनाते हैं रंग

फूलों की बनी रंग से होली खेलने से नही होती त्वचा रोग

दुद्धी । इस चकाचौंध एवं आधुनिक युग में भी आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों में आज भी प्राकृतिक रंगों से ही होली खेलते हैं। लोग होली के दिन एक से बढ़कर एक महंगी केमीकल युक्त रंग, गुलाल व अबीर का प्रयोग करते है। वहीं आदिवासी दुद्धी तहसील के सबसे दुरूह व पहाड़ी इलाका करहिया, बोधाडीह, औराडंडी, बगरवा तथा नगवां आदि गांवों में आज भी प्राकृतिक फूलों के रंग से होली खेली जाती है। यहां के मूल निवासी चेरो, गोड, खरवार, परहियां जैसी आदिवासी जातियां पलास,(टेसु) फुलझडी,सेमल आदि के फूलों से बनायी रंगो से होली खेलते हैं। जो खुद अपने हॉथों से रंगों को तैयार करते हैं। इसके लिए एक सप्ताह पहले से ही फूलों को तोड़कर एकत्रित करना तथा रंग बनाने का कार्य शुरू कर दिया जाता है, ताकि होली के दिन तक रंग पर्याप्त मात्रा मे तैयार हो जाये।आदिवासियों का कहना है कि हम लोग आज तक अपने हॉथों से प्राकृतिक फूलों के बनाये रंगो से ही होली खेलते आये हैं। जो आज भी अनवरत चल रहा है।हालांकि बढ़ते प्रदूषण तथा अंधा धुंध कटते जंगलो के कारण अब पर्याप्त मात्रा मे फूलों का मिलना बड़ी मुश्किल हो गया है फिर भी किसी तरह से अभी तक काम चलाया जा रहा है। लोगों ने बताया कि प्राकृतिक फूलों से बनाया गया रंग तथा गुलाल काफ़ी टिकाऊ भी होता है। जो एक बार रंग लग जाए तो उसकी पहचान पूरे साल भर तक रहता है और सबसे खास बात कि प्राकृतिक रंगो से कभी भी किसी को कोई नुकसान या चेहरे पर कोई दाग़ नहीँ पड़ता है।

इनसेट –
इस तरह से तैयार की जाती है फूलों की रंग-

दुद्धी। क्षेत्र के दुरूह इलाकों मे आदिवासी होली खेलने के लिए अपने हॉथो से रंगो को तैयार करते है। पहले पलास,सेमल तथा फुलझडी आदि की फूलों को तोड़कर सुखाने के बाद अच्छी तरह से कुट कर फिर बड़े बर्तन में पानी के साथ काफ़ी देर तक उबालते है।जब पानी गाढा हो जाता है तब कपड़े से छानकर रंग को सुखाकर रख लेते है। उसी तरह से विभिन्न प्रकार के फूलों को सुखाकर शील पर खूब महिन पीसकर अबीर तैयार किया जाता है।आदिवासियों ने बताया कि यह क्षेत्र शहर के धूम धड़ाम से दूर लोग अपने अलग अंदाज में त्यौहार मनाते है।परम्परागत छाप छोड़ती इनकी जीवन शैली में थोड़ी बिभिन्नता जरूर है परन्तु सिमित संसाधनो के बावजूद एकता का परिचय देते हैं और होली मनाने की अपनी पुरानी परंपरा को संजोए हुए है।



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