फिल्म ‘द इनविजिबल मैन’ जी समीक्षा


ली वैनल द्वारा निर्देशित ‘द इनविजिबल मैन’ इसी कथ्य को केंद्र में रख कर बनाई गई फिल्म है। यह 1897 में प्रकाशित हुए एच.जी. वेल्स के उपन्यास ‘द इनविजिबल मैन’ का आधुनिक रूपांतरण है। इस पर 1933 में जैम्स वेल इसी नाम से एक क्लासिक फिल्म बना चुके हैं। इस पर कई टीवी शो भी बन चुके हैं। हालांकि उपन्यास मूल रूप से ‘साइंस फिक्शन’है, लेकिन ली वैनल ने ‘द इनविजिबल मैन’ के अपने संस्करण में एक नया फ्लेवर भी जोड़ दिया है, और वह है साइकोलॉजिकल थ्रिलर का। बल्कि यूं कहें कि मनोविज्ञान वाला कोण ही फिल्म का मुख्य विषय है, जिसे विज्ञान की चाशनी में लपेट कर पेश किया गया है, तो गलत नहीं होगा।

क्या हैं फिल्म की कहानी?
सेसेलिया (एलिजाबेथ मॉस) का पति एड्रियन (ओलिवर जैक्सन कोवेन) एक जीनियस वैज्ञानिक है। वह मन की बात को पढ़ लेता है। वह सेसेलिया को अपने अधिकार में इतना ज्यादा रखता है कि वह डर जाती है। एक दिन वह उसके घर से किसी तरह बच के भाग जाती है और अपनी बहन एमिली (हैरिएट डायर) के पास पहुंचती है। एमिली उसे अपने एक अच्छे दोस्त जेम्स (एल्डिस हॉज) के घर में रखवा देती है। जेम्स की बेटी सिडनी (स्टॉर्म रीड) के साथ सेसेलिया की अच्छी निभती है। लेकिन यहां आकर भी वह बेखौफ नहीं रह पाती। उसे लगता है कि उसका पति एड्रियन उसके पीछे पड़ा है। वह दिखाई नहीं देता, लेकिन सेसेलिया उसकी मौजूदगी को भांप जाती है। वह एड्रियन के भाई टॉम (माइकल डोरमैन) को यह सब बताती है। टॉम भी एड्रियन की बदसलूकी का शिकार रहा है। लेकिन टॉम कहता है कि एड्रियन मर चुका है और उसने उसकी लाश भी देखी है। कोई भी सेसेलिया की बात पर भरोसा नहीं करता। लोग उसे पागल समझने लगते हैं और एक अस्पताल में भर्ती करा देते हैं। अब सेसेलिया खुद ही सच्चाई का पता लगाने का फैसला करती है… ली वैनल ने मूल उपन्यास की कथा को भले ही ज्यों का त्यों फिल्म में इस्तेमाल नहीं किया है और अपनी तरफ से ठीकठाक मिलावट कर दी है, लेकिन वह जो कहना चाहते हैं, उसमें सफल रहे हैं।

फिल्म में एक्टिंग, डायलॉग और डायरेक्शन:
फिल्म में थ्रिल है। खासकर दूसरे हाफ में यह फिल्म ज्यादा रोमांचक लगती है। दरअसल, पहले हाफ का इस्तेमाल उन्होंने माहौल बनाने में किया है। मध्यांतर के पूर्व फिल्म थोड़ी सुस्त लगती है, लेकिन उसके बाद गति और रोमांच आता है। पटकथा ठीक है। कई दृश्यों में शरीर में थोड़ी सिहरन भी पैदा होती है। सिनमेटोग्राफी अच्छी है। विजुअल इफेक्ट्स विषय को पूरी तरह सपोर्ट करते हैं। बैकग्राउंड म्यूजिक भी असरदार है।

एक टूटी, डरी हुई महिला और अपने ऊपर भरोसा करने वाली महिला के रूप में एलिजाबेथ मॉस का काम तारीफ के काबिल है। उनके चेहरे पर जो भाव आते हैं, वह दर्शकों के मन से जुड़ते हैं। उन्होंने अपने किरदार के हर पहलू को बहुत अच्छे से पेश किया है। माइकल डोरमैन, एल्डिस हॉज का काम भी अच्छा है। ओलिवर जैक्सन कोवेन, हैरिएट डायर और स्टॉर्म रीड भी अपनी भूमिकाओं में जमे हैं। अगर आपको साइंस फिक्शन में रुचि है, तो आपको यह फिल्म अच्छी लगेगी।


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