शिवद्वार धाम में स्थापित है शिव शक्ति की सैकड़ों साल पुरानी अद्वितीय प्रतिमा

राजकुमार गुप्ता (संवाददाता)

-महाशिवरात्रि पर लगता है 10 दिनों तक चलने वाला मेला

-श्रावण मास में लाखों कांवड़िए यहां करते हैं जलाभिषेक

-भक्तों की मनोकामना पूर्ण करते हैं बाबा भोलेनाथ

घोरावल। गुप्तकाशी एवम दक्षिणकाशी नामों से विख्यात शिवद्वार धाम शैव सम्प्रदाय के सनातन मतावलंबियों की आस्था का प्रमुख केंद्र बन चुका है।आदिदेव महादेव एवम माता पार्वती के दुर्लभ व विलक्षण विग्रह का दर्शन पूजन करने के लिए दूर दूर से यहां पर श्रद्धालुओं का आगमन होता है।महाशिवरात्रि पर यहां प्रत्येक वर्ष 10 दिनों तक चलने वाले परम्परागत मेला का आयोजन किया जाता है।

उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिला मुख्यालय के दक्षिण-पश्चिम में 39 किलोमीटर दूर और घोरावल तहसील मुख्यालय के दक्षिण में 10 किलोमीटर दूर अवस्थित शिवद्वार धाम आज परिचय का मोहताज नहीं है।आदिम सभ्यता के साक्षी बेलन नदी के करीब शिवद्वार मंदिर में स्थापित आशुतोष भगवान शिवशंकर और आदिशक्ति माता भगवती की काले पत्थर से बनी साढ़े चार फीट ऊंची इस अद्वितीय मूर्ति का दर्शन करने पर निगाहें उस पर से नही हटती हैं।कुछ विद्वानों के अनुसार यह प्रतिमा 11 वीं सदी की है, जबकि कुछ इसका कालखंड 8 वीं सदी अथवा और अधिक पुराना बताते हैं।

उमामहेश्वर की यह संपृक्त प्रतिमा 1305 फसली सन में मोती महतो नामक व्यक्ति को मिली थी।किंवदंतियों के अनुसार खेत में हल जोतते समय यह दिव्य प्रतिमा प्राप्त हुई थी, जिसे मोती महतो ने वहां पर एक मंदिर बनवाकर स्थापित कराया था।शिवद्वार के बाबू जगतबहादुर सिंह की धर्मपत्नी बहुरिया अविनाश कुँवरि ने शिवद्वार मंदिर का निर्माण सन 1942 में अपने स्वर्गीय पति की पुण्यस्मृति में कराया था।चुनार के कारीगरों द्वारा चुनार के पत्थर से तीन वर्षों में मंदिर का निर्माण हुआ था।कालांतर में बाहरी मंडप, परिक्रमा पथ, यज्ञशाला इत्यादि का निर्माण धर्मप्राण लोगों के सहयोग से हुआ।सन 1985 में परमहंस आश्रम अमेठी के श्री हरिचैतन्य ब्रह्मचारी की प्रेरणा से बद्रिकाश्रम के शंकराचार्य जगद्गुरू स्वामी विष्णु देवानन्दजी सरस्वती महाराज के कर कमलों से मंदिर में श्रीशिवलिंग की वैदिक रीति से स्थापना एवम प्राण प्रतिष्ठा की गई थी।

उमामहेश्वर की इस दिव्य प्रतिमा में त्रिनेत्रधारी शिव की जटाओं, बाहों व गले में रुद्राक्ष, कानों में बिच्छुओं का कुंडल, गले में नागदेव का कण्ठहार, मस्तक पर अर्धचंद्र, हांथों में त्रिशूल व डमरू, जटाओं के बीच मां गंगा की दिव्य धारा, कटि प्रदेश में बाघम्बर बेहद कुशलता व बारीकी से शिल्पकार द्वारा गढ़ा गया है।साढ़े चार फीट की काले पत्थर की इस मूर्ति में भगवान शिव के बाएं जंघे पर बैठी माँ पार्वती के बाएं हाथ में दर्पण सुशोभित है।माँ ने अपनाबायां हाथ शिवशंकर के कंधे पर रखा है।प्रतिमा में भगवान गणेश,कार्तिकेय व अन्य देवी देवताओं की नयनाभिराम मूर्तियां भी गढ़ी गई हैं।भगवान शिव व माता पार्वती के मन्द मन्द मुस्कान का आभास कराते पतले पतले अधर शिल्पकार की विलक्षण प्रतिभा को दर्शाते हैं।इस अद्वितीय मूर्ति को देखकर आभास होता है कि शिव पार्वती एक दूसरे के दिव्य व अंनत रूप को अपलक निहार रहे हैं।

शिवद्वार मंदिर के मुख्य पुजारी सुरेश गिरि,शिवराज गिरि व अजय गिरि ने बताया कि यहां दर्शन पूजन करने वाले भक्तों की भगवान शिवशंकर हर मनोकामना पूर्ण करते हैं और मनोवांछित फल प्रदान करते हैं।यहां उत्तर प्रदेश के विभिन्न इलाकों के साथ ही मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, झारखंड, दिल्ली समेत विभिन्न स्थानों से भक्तगण उमामहेश्वर की दिव्य प्रतिमा का दर्शन करने आते हैं।श्रावण मास में यहां एक महीने का मेला लगता है, जिसमें लाखों कांवड़िए भगवान भोलेनाथ का जलाभिषेक करते हैं।महाशिवरात्रि एवम वसंतपंचमी के पर्व पर भी यहां परम्परागत मेला आयोजित किया जाता है।


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