विश्व रेडियो दिवस आज, फिर लौट रहा रेडियो का दौर

आनन्द कुमार चौबे (संवाददाता)

सोनभद्र । आज आधुनिकता के दौर में जहां टेलीविजन की लोकप्रियता बढ़ती जा रही है वहीं रेडियो के चलन को पीएम मोदी ने एक बार फिर बढ़ाने के लिए रेडियो पर ‘मन की बात’ जैसे कार्यक्रम को लेकर एक अच्छी पहल की शुरुआत की । रेडियो को जहां लोग भूल चुके थे, मन की बात कार्यक्रम को लेकर एक बसर फिर लोगों ने इसे रखना शुरू किया । यह दीगर है कि बहुआयत में नहीं देखने को मिल रहा लेकिन गांव व मुहल्ले में रेडियो की संख्या में इजाफा हुआ है । वहीं इसकी लोकप्रियता को बढ़ाने के लिए बीजेपी ने कार्यक्रम कर रेडियो का वितरण भी कराया।
आप सोच रहे होंगे कि आखिर अचानक रेडियो को लेकर इतनी चर्चा क्यों? तो आपको बता दें कि आज विश्व रेडियो दिवस है।

कभी रेडियो पर क्रिकेट मैच का कमेंट्री ….”मैच की आखिरी गेंद..और ये लगा….शानदार चौका”! कौन भूल सकता है? कमेंट्री भी ऐसी कि सुनने वालों का कभी-कभी धड़कन तेज व धीमा हो जाया करता था।

वहीं अमीन साहनी साहब का वह अंदाज….भाइयों और बहनों…बिनाका गीत माला के पहले पायदान पर है यह गीत……! जैसे तमाम कार्यक्रम भले ही बन्द हो गए हों मगर आज भी लोगों के बीच चर्चा में जिंदा है।

वहीं दो दशक पहले जब कृषि मामलों के जानकार डॉ0 सुशील कुमार राय की आवाज ओबरा आकाशवाणी से आती तो नक्सल प्रभावित सोनभद्र सहित मध्यप्रदेश, झारखंड, छत्तीसगढ़ आदि के सीमावर्ती जनपदों के किसान रेडियो से चिपक जाते थे। बतौर एफएम ओबरा आकाशवाणी का खेती-बाड़ी कार्यक्रम इतना सफल रहा कि छोटे-छोटे बच्चे भी डॉ0 सुशील कुमार राय की आवाज पहचानते थे। जब डॉ0 राय क्षेत्र में निकलते थे तो आदिवासियों की भीड़ उन्हें केवल देखने के लिए जुट जाती थी। संचार व्यवस्था के नाम पर शून्य रहे इस क्षेत्र में ओबरा आकाशवाणी संचार क्रांति के रूप में आया था। पहली बार आदिवासियों को रेडियो से गाना सुनने के साथ ही काफी कुछ जानने का मौका मिला था।

उस दौर को याद करते हुए रॉबर्ट्सगंज क्षेत्र के उमाकांत चौबे, विमलेश चौबे, बिंदु मिश्रा, कयर, भोला बताते हैं कि “उस दौर में रेडियो का चलन बहुत ही ज्यादा था, विवाह में दहेज के रूप में रेडियो देने का प्रचलन था। उस समय हम लोग युवा थे तो क्रिकेट का मैच हो या देश दुनिया का समाचार या फिर गर्मी को दोपहरी बिताने का वक्त अक्सर एक रेडियो को घेर कर सब कमेंट्री, समाचार और गाना सुनते थे।”

वहीं चुर्क क्षेत्र के सतीश लाल वर्मा व बच्चे लाल जायसवाल बताते हैं कि “उस दौर में रेडियो का जबरदस्त क्रेज था, सभी कार्यक्रमों का समय जबान पर याद रहता था। खेती बाड़ी से जुड़े कार्यक्रम व समाचार हम लोग ज्यादा सुनते थे। तो कभी-कभी गाना भी सुनकर समय काट लिया जाता था लेकिन अब मोबाइल आने से रेडियो से दूरी बढ़ गयी है।”

वहीं रेडियो से दूर हो रही आज की पीढ़ी मोबाइल के जरिये एफएम रेडियो के जरिए फिर से जुडऩे लगी है। शहर में बढ़ती एफएम रेडियो चैनल्स की संख्या ने यह साबित कर दिया है कि नए कलेवर में रेडियो फिर से छा गया है।
बहुत सारे लोग अपने कामकाज को लेकर अधिकांश समय ट्रेवलिंग में बिताते हैं और ऐसे में एफएम रेडियो पर सुरीले गाने उनके सफर को और आसान बना देते हैं। मोबाइल फोन में रेडियो सुनने की सुविधा आ जाने से इसे फिर से नया जीवन मिला है। कभी खेत-खलिहान में किसान-मजदूर से लेकर शिक्षित पीढ़ी तक जिंदगी का हिस्सा बन चुका रेडियो आज नए कलेवर में पहुँच गया है।

“भले ही आज विश्व रेडियो दिवस मनाया जा रहा है लेकिन जनपद सोनभद्र में इसे लेकर न तो कोई सरकारी और ना ही कोई गैर सरकारी कार्यक्रम आयोजित किया गया। एक तरफ सरकार जहां रेडियो को फिर से स्थापित करने पर जुटी है और इसके महत्व को बढ़ाने के लिए 13 फरवरी को एक दिवस के रूप में मनाया जा रहा है लेकिन सोनभद्र में इस दिवस को लेकर किसी कार्यक्रम की कोई सूचना नहीं मिली।”


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