बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़, जिम्मेदार कौन ?

आनन्द कुमार चौबे (संवाददाता)

सोनभद्र । योगी सरकार ने सरकारी स्कूलों में बच्चों के चहुँमुखीं विकास के लिए पढ़ाई से लेकर खेल तक शामिल किया है । ताकि बच्चों में मानसिक विकास के साथ शारीरिक विकास हो सके। लेकिन योगी सरकार के प्रयास के बाद भी शिकायतों में कमी नहीं आ रही। पिछले कुछ महीनों में सरकारी स्कूलों की वजह से सरकार की काफी किरकिरी हुई है, चाहे मिड डे मील में नमक रोटी परोसने वाली घटना हो या फिर पानी में दूध मिलाने की घटना हो। शायद यही कारण है कि गोरखपुर में सीएम योगी ने एक शिक्षक समारोह में अध्यापकों को कर्तव्य बोध कराते हुए कहा कि टीचरों को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी । मगर क्या टीचर अपनी जिम्मेदारी को समझ रहे हैं, आज “जनपद न्यूज live” इसका खुलासा करेगा। आज “जनपद न्यूज live” आपको बताएगा कि आखिर सरकार द्वारा दी जा रही सुविधाओं के बाद भी अध्यापक अपनी जिम्मेदारी क्यों नहीं समझ रहे हैं।

योगी सरकार स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की प्रतिभा को आगे लाने के लिए इस बार हर स्कूलों में खेलकूद के सामान खरीदने के लिए बजट उपलब्ध कराया था ताकि बच्चे न्याय पंचायत स्तर से खेलकर ब्लाक स्तर पर और फिर जिले स्तर पर पहुँचे, जहाँ से चयनित होकर वो मंडल व राज्य स्तर पर खेल सकें। मगर सोनभद्र में अध्यापकों की इच्छाशक्ति की कमी ने कारण कई स्कूली बच्चों के भविष्य पर सवाल खड़ा कर दिया है।
आज “जनपद न्यूज live” आपको दिखायेगा कि आखिर करोड़ों रुपये खर्च करने के बाद भी योगी सरकार क्यों फेल है। जिले में कई न्याय पंचायत स्तर पर खेलकूद आयोजित न होने से जनपद के गरीब आदिवासी बच्चे न तो अपनी प्रतिभा दिखा सके और न ही सरकार द्वारा खरीदे कराए गए खेलकूद के सामानों का उपयोग ही हो सका। अब आपको हम योगी सरकार के उन जिम्मेदार अध्यापकों का बयान सुनाते हैं, जिसके भरोसे सरकार बेहतर राष्ट्र निर्माण का सपना देख रही है। मगर उन्हीं अध्यापकों की सोच व इच्छाशक्ति की वजह से सरकार की लगातार किरकिरी भी हो रही है।

ऊँचडीह प्राथमिक स्कूल की प्रधानाध्यापिका शशिकला का कहना हैं कि “उनके बच्चे खेलकूद में भाग नहीं लेते क्योंकि उनकी रुचि नहीं है। उन्होंने यह भी माना कि बच्चों को खेल के लिए प्रेरित करना चाहिए लेकिन खुद को कैमरे पर फँसता देख उन्होंने तत्काल अपनी गलती भी मान ली।”

वहीं लगभग 25 विद्यालयों की महिला प्रभारी सुगवंती देवी का कहना है कि “खेलकूद होना चाहिए लेकिन बच्चों को लाने व ले जाने की जिम्मेदारी की वजह से 5 विद्यालयों में ही खेलकूद हो सका, शेष पर अध्यापकों ने प्रतियोगिता नहीं कराया। महिला प्रभारी की दलील है कि बच्चों के खेलकूद में उनके अभिभावक भी रुचि नहीं लेते जिसके वजह से वो अपने बच्चों को भाग लेने के लिए नहीं भेजते। इनका भी मानना हैं कि नियमानुसार सभी स्कूलों में न्यायपंचायत स्तर पर प्रतियोगिता होनी चाहिए।”

जबकि एक अन्य न्याय पंचायत प्रभारी कमलेश कुमार ने सरकार के नीति व व्यवस्था पर सवाल खड़ा करते हुए कहा कि “सरकार ने खेलकूद के सामान खरीदने के लिए पैसा दिया था, मगर बच्चों को लाने व ले जाने के लिए उन्हें अपनी जेब से खर्च करना पड़ता है। इतना ही नहीं सरकार की उदासीनता के कारण अध्यापकों को चंदा इक्कठा कर प्रतियोगिता करानी पड़ती है।”

ऐसा नहीं हैं कि यह उदासीनता जिले स्तर तक है। जिले स्तर पर जिलाधिकारी से लेकर बेसिक शिक्षा अधिकारी का भाषण सुनने में भले ही अच्छी व नसीहत भरी लगती हो मगर अध्यापकों की उदासीनता मिट नहीं सकी। इतना ही नहीं करोड़ों रुपये खर्च करने के बाद भी मंडल स्तर पर कराए गए बैडमिंटन की प्रतियोगिता नेट की जगह महज एक रस्सी बांधकर खिला दिया गया। बच्चों को नेट तक नसीब नहीं हुआ।

जब इस सम्बंध में कोई भी अधिकारी बोलने को तैयार नहीं था।

बहरहाल सरकारी स्कूलों पर पानी की तरह पैसा खर्च करने के बाद भी रिजल्ट न मिलना मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के चिंता का सबब है। शायद यही कारण है कि गोरखपुर के एक शिक्षक कार्यक्रम में शिरकत करने पहुंचे सीएम योगी ने मौका देखकर अध्यापकों को अपनी जिम्मेदारी संभालने की नसीहत दे डाली। बड़ा सवाल ये उठता है कि क्या सीएम की नसीहत के बाद भी जिम्मेदार चेतेंगे या फिर वहीं ढाक के तीन पात की कहानी दोहरायी जाएगी।


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