‘अब सांस भी नहीं आ रही है, भैया…। भैया, क्या होगा भैया?

दिल्ली के फिल्मिस्तान की अनाज मंडी की एक फैक्ट्री 600 गज में बनी थी । रविवार सुबह आग की एक चिंगारी ऐसी भड़की कि 43 जिंदगियां झुलस गईं। सिर्फ 43 लोगों की मौत नही हुई । 43 परिवार तबाह हो गए । मरने वालों में अधिकतर वो मजदूर थे जो अपना परिवार पालने के लिए घर से दूर थे । जो अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए कमाने निकले थे लेकिन अब पीछे रह गया तो सिर्फ दर्द । और इस दर्द के बीच से एक ऐसी चीख निकली जो कलेजा चीर देती है । चीख मुशर्रफ की जिसने मौत की आहट अपनी ओर आते महसूस की लेकिन कुछ कर नहीं सका ।

जब फिल्मिस्तान की फैक्ट्री में आग लगी मुशर्रफ राहत का इंतजार कर रहा था । फिर एक वक्त ऐसा आया जब उसकी हिम्मत जवाब दे गई और तब उसने अपने दोस्त मोनू को फोन किया, ये मुशर्रफ के जीवन की आखिरी कॉल थी ।

‘घर का ध्यान रखना भैया… आज तो गया मैं… कल को लेने आ जैयो।’ ये आखिरी शब्द थे अनाज मंडी इलाके की एक बिल्डिंग में आग लगने की घटना में मारे गए मूसा के। रविवार को हुए रूह कंपा देने वाले इस अग्निकांड ने 43 जिंदगियां लील लीं। इसी में एक मूसा ने दम तोड़ने से पहले अपने पड़ोसी को फोन लगाया था। बातचीत के दौरान वह कई बार रोने लगा, उसकी आवाज लड़खड़ा रही थी। बिल्डिंग में धुआं भर जाने के कारण उसे सांस लेने में दिक्कत हो रही थी। उसने कहा, ‘अब सांस भी नहीं आ रही है, भैया…। भैया, क्या होगा भैया? भैया गए अब तो। अब दो-चार मिनट का मामला है।’

शोभित को मुशर्रफ अली की आखिरी कॉल

30 साल के मुशर्रफ अली उर्फ मूसा की इस फोन कॉल की रिकॉर्डिंग से उस भयावह मंजर का अंदाजा लगाया जा सकता है। उसने बिजनौर में अपने पड़ोसी मोनू (शोभित अग्रवाल) को रविवार की सुबह तब फोन लगाया था जब उसे लगा कि अब उसका बचना मुश्किल है। वह चार साल से फैक्ट्री में काम कर रहा था। चार बच्चों का पिता मूसा बातचीत के दौरान कराह रहा था। उसने मोनू से पूछा कि क्या वह अब भी फोन लाइन पर है? उसने कहा, ‘हेलो?’ जब उधर से आवाज आई तो मूसा ने कहा, ‘ठीक है भैया मोनू? जैसे-तैसे मेरे घर को चला लियो… बच्चों के बड़े होने तक… या अल्लाह… अभी किसी को मत बताना… आराम से बताना… और तैयारी कर लियो यहां आने का।’

उसने मोनू से निजामुद्दीन के किसी व्यक्ति से उधार के 5 हजार रुपये वसूलने को भी कहा। इस पर मोनू ने उसे ढाढस बंधाया, ‘कर लेंगे भैया… तू टेंशन मत ले… आ रहे हैं भैया… वो गाड़ी नहीं आई क्या? पानी वाली? कोशिश कर बचने की… निकलने का रास्ता नहीं है?’ जवाब में मूसा ने कहा, ‘भागने का कोई रास्ता नहीं है, भैया।’ दर्द से उसकी कराह बढ़ गई जो फोन कॉल में रिकॉर्ड हो गई है।

बाद में मूसा के भाई फुरकान सलीम ने एलएनजेपी अस्पताल के बाहर कहा, ‘मैंने उसकी लाश पहचान ली है। पुलिस ने मुझे कहा कि अंत्यपरीक्षण (ऑटोप्सी) के बाद शव को सौंप देंगे। उसके शरीर पर जलने का कोई निशान नहीं था। लगता है कि वह दम घुटने से मर गया। मुझे उसके बच्चों की चिंता हो रही है।’
अफजल ने बताया, कैसे बचाई जान
कुछ खुशनसीब थे जो इस भीषण अग्निकांड में बच निकले। उन्हीं में से एक मोहम्मद अफजल ने बताया कि उसने कैसे अपनी जान बचाई। उसने कहा, ‘जब आग लगी तो मैं तीसरी मंजिल पर सो रहा था। कमरे में 11 और लोग थे। हमें 4-4.30 बजे के आसपास धुआं फैलने का अहसास हुआ। आग हमारे बगल वाले कमरे तक पहुंच चुकी थी।’

अफजल ने अपने मुंह पर कपड़ा रख लिया और अगले दो घंटों तक रुक-रुक कर सांस लेता रहा। उसने बताया, ‘मैं खिड़की के पास ही रहा, लेकिन इतनी ऊंचाई से कूदना मुश्किल था। मुझे पुलिसवालों ने करीब 5.30 बजे वहां से निकाल लिया। बाकी मुझे कुछ याद नहीं।’ अफजल का इलाज लेडी हार्डिंग अस्पताल में चल रहा है।

बड़ा भाई बच निकला, छोटे की हुई मौत
28 वर्ष का वाजिद जब एलएनजेपी अस्पताल के शव गृह में पड़ी अपने 23 वर्ष के भाई साजिद की लाश देखकर लौटा तो वह लगभग अचेत होकर जमीन पर गिर गया। उसे रिश्तेदारों ने संभाला। उसे यह विश्वास नहीं हो रहा था कि वह तो बच निकला, लेकिन उसका भाई अब इस दुनिया में नहीं है। एक रिश्तेदार ने बताया कि वह अपने छोटे भाई साजिद को वहां से निकालने में नाकामयाब रहा और उसकी (साजिद) दम घुटने से मौत हो गई।



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