कैलावर स्थित यज्ञ स्थल पर कथा सुनाते : प्रपन्नाचार्य जीयर स्वामी

सुधींद्र पांडेय (संवाददाता)

चहनियां । कैलावर स्थित यज्ञ स्थल पर चतुर्मासा महायज्ञ के 114 वे दिन सन्त लक्ष्मी प्रपन्न जीयर स्वामी ने कहा कि शुकदेवजी महाराज से राजा परीक्षित ने पुछा की ये हमारे भावना आएंगे कैसे। तो सुकदेव जी महाराज ने कहा कि इसके लिए योग को करना पडेगा। तो फिर प्रश्न किया कि योग कितने हैं किसे कहते हैं। योग केवल इतना ही नही की सांस को लेना फिर छोड़ना। यह केवल स्वास्थ्य लाभ के लिए अच्छा है। लेकिन इतने से हम योग के अधिकारी हो जाएंगे यह बात नही है। योग का अर्थ है कि हमारा मन, चित् बुद्धि कहीं भटक गया है, कहीं अटक गया है, उसको चारो तरफ से केन्द्रित करके, पकड़ करके, समझा करके और एक जगह ला करके बांध लेना इसी का नाम है योग।
चित् की चंचलता को रोका नही जा सकता।स्वामी जी महाराज ने बताया कि चित् की चंचलता को रोका नही जा सकता है। मोड़ा जा सकता है। इसको दुसरे जगह ट्रांसफर किया जा सकता है। प्रतिस्थापित किया जा सकता है। जो चीज नही रूकने वाला है उसे कैसे आप रोक सकते हैं। इसलिए मन को लगाना है तो वहां लगाइए जिसने पुरे संसार को बनाया है। उन्ही में अपनी चित् की चंचलता को लगा दीजिए। और जब जब मन करता है कुछ गुनगुनाने की तो मुरली वाले की नाम को गाइए। घुमने की इच्छा हो तो क्लब में मत जाइए। बल्कि विन्ध्याचल, अयोध्या, मथुरा, काशी चले जाइए। ऐसा करने से एक न एक दिन जो गलत प्रक्रियाओं में लग गया है वह अगत्या मुड़ जाएगा और मुड़कर हमेशा-हमेशा के लिए उससे अलग हो जाएगा।


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