जानें, अक्षय नवमी को आँवले के नीचे भोजन करने की क्या हैं परम्परा ?

रमेश यादव (संवाददाता)

दुद्धी। कार्तिक शुक्ल पक्ष की नवमी अक्षय नवमी कहलाती है। यों तो पूरे कार्तिक मास में स्नान का महत्व है, परंतु नवमी को स्नान दान पूजन करने से अक्षय पुण्य प्राप्त होता है। इस दिन अनेक लोग व्रत भी करते हैं और कथा वार्ता व पूजन प्रक्रिया में दिन बिताते हैं।
एक बार माता लक्ष्मी पृथ्वी भ्रमण करने आईं। रास्ते में भगवान विष्णु एवं शिव की पूजा एक साथ करने की इच्छा हुई। लक्ष्मी मां ने विचार किया कि एक साथ विष्णु और शिव की पूजा कैसे हो सकती है। तभी उन्हें ख्याल आया कि तुलसी और बेल का गुण एक साथ आंवले में पाया जाता है। तुलसी भगवान विष्णु को प्रिय है और बेल शिव जी को।
आंवले के वृक्ष को विष्णु और शिव का प्रतीक चिन्ह मानकर मां लक्ष्मी ने आंवले की वृक्ष की पूजा की। पूजा से प्रसन्न होकर विष्णु और शिव प्रकट हुए। लक्ष्मी माता ने आंवले के वृक्ष के नीचे भोजन बनाकर विष्णु और भगवान शिव को भोजन करवाया। इसके बाद स्वयं भोजन किया। जिस दिन यह घटना हुई थी, उस दिन कार्तिक शुक्ल नवमी थी।
तभी से यह परंपरा चली आ रही है। अक्षय नवमी पर अगर आंवले की पूजा करना और आंवले के वृक्ष के नीचे बैठकर भोजन बनाना और खाना संभव नहीं हो तो इस दिन आंवला जरूर खाना चाहिए।
कार्तिक शुक्ल नवमी को आंवले की पूजा व उसकी छांव में भोजन का विशेष महत्व माना गया है। मान्यता है कि कार्तिक मास की नवमी को आंवला के पेड़ के नीचे अमृत की वर्षा होती है। कार्तिक शुक्ल नवमी तिथि में आंवले की पूजा को पुत्र प्राप्ति के लिए भी विशेष लाभदायक माना गया है। इस दिन को आंवला नवमी के नाम से भी जाना जाता है। नवमी के दिन जगह-जगह श्रद्धालु गण आंवला वृक्ष के नीचे पूजा-पाठ करके भगवान विष्णु की विधिवत पूजा अर्चना कर भोजन भी ग्रहण करतें है। इस दिन आंवले के पेड़ से अमृत की वर्षा मानी गई है।

ऐसी मान्यता है कि कार्तिक शुक्ल नवमी तिथि को आंवले के पेड़ से अमृत की बूंदे गिरती है और यदि इस पेड़ के नीचे व्यक्ति भोजन करता है तो भोजन में अमृत के अंश आ जाता है। जिसके प्रभाव से मनुष्य रोगमुक्त होकर दीर्घायु बनता है।
वैसे आंवले के महत्व को वैज्ञानिक भी मान्यता देते हैं। आंवले में विटामिन सी की भरमूर मात्रा होती है। इसीलिए कार्तिक शुक्ल नवमी पर श्रद्घालु आंवले के पेड़ की पूजा करके इसी पेड़ की छांव में भोजन ग्रहण करते हैं।


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