मल्देवा गांव के दीये से जगमगाएंगे उर्जान्चल के शहर व गांव

रमेश यादव(संवाददाता)

दुद्धी । फैशन के इस दौर में जहां चमक-धमक लोगों को आकर्षित कर रहा है और दीपों के पर्व दीपावली में भी चाइनिज झालर बत्ती जगह लेता जा रहा है । वही आज भी मिट्टी की दीयों की मांग कम नहीं है इसलिए दीपकों का पर्व दीपावली नजदीक आते देख कारोबारी मिट्टी का दीए बनाने में जुट गए हैं। दुद्धी से सटे मल्देवा गांव में बने मिट्टी के दीये काफी प्रसिद्ध हैं। यहाँ के मिट्टी के दीये दीपावली को उस उर्जान्चल क्षेत्रों को रौशन करती हैं जो देश के आधे हिस्सों में बिजली पहुंचाकर रौशन करता है । अनपरा, शक्तिनगर, बीजपुर, रेनुकूट तथा सिंगरौली सहित अन्य क्षेत्रों में मल्देवा गांव के दीये की काफी मांग रहती है । लोग यहीं के दीये को जलाना ज्यादा पसंद करते हैं ।

दीया बनाने वाले कारीगर हरिहर प्रजापति व अन्य कारीगर दीपावली पर्व के मद्देनजर तेजी से मिट्टी के दीये बनाने में जुटे हुए हैं ।कुम्हारों ने बताया कि बाजार में मांग के अनुसार दीए बनाए जाते है । किसी दीपावली में अधिक बिक्री होती हैं तो किसी त्यौहार में कम होता हैं । फुटकर दीए 80 -100 ₹ प्रति सैकड़ा तक बिक जाता है। जबकि थोक में 60 – 80 रूपये प्रति सैकड़ा बिक्री होती हैं । मल्देवा गांव के नन्दू प्रजापति, गोवर्धन प्रजापति, अवध नाथ प्रजापति, प्रेमचंद प्रजापति सहित अन्य कुम्हार परिवार मिट्टी के दीयो तथा खिलौने आदि बनाने में जोर-शोर से जुटे हुए हैं ।

बता दें कि मल्देवा गांव से बने मिट्टी की दीयो की मांग उर्जान्चल में खूब रहती हैं क्योंकि यहां की मिट्टी के दीयो में खूबसूरती अच्छी होती हैं जिससे वह आकर्षक होती हैं ।मिट्टी के वर्तनों के निर्माण का कारोबार मल्देवा गांव में काफी पुराने समय से की जाती हैं । आज जहाँ लकड़ी की सबसे अधिक किल्लत है ऐसे में मल्देवा गांव के कुम्हार अपनी व्यवसाय को बखूबी संजोए हुए हैं । कुम्हारों का कहना है कि आज बढ़ते महंगाई में मिट्टी तक खरीदना पड़ता हैं और जितना मेहनत मिटटी के दीये और वर्तन बनाने में मेहनत लगता हैं उतना कमाई नही मिल पाती हैं । फिर भी अपने व्यवसाय को बनाए रखने के लिए मिट्टी के बर्तन के कारोबार को ही करते रहते हैं ।कुम्हारों को शासन से अपेक्षा है कि जिस तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में कुम्हारों को चॉक आदि उपलब्ध कराए गए हैं उसी तरह यदि यहां भी उपलब्ध कराती तो हमलोगों के व्यवसाय में कुछ सुधार होता ।कुछ कुम्हारों ने पूर्व रेलमंत्री लालू प्रसाद यादव का नाम लेते हुए कहा कि उन्होंने अपने कार्यकाल में कुल्हड़ को बढ़ावा दिया था जिससे रेलवे में हमारे कुनबे के लोगों को काफी मात्रा में कुल्हड़ बेचने का मौका मिला।अब जब प्लास्टिक के गिलास पर प्रतिबंध लगने से एक बार फिर उम्मीद जगी है।

बता दें कि जब लालू प्रसाद यादव रेल मंत्री थे तो उन्होंने चाय कुल्हड़ में बेचे जाने का निर्णय लिया था तब काफी हद तक कुम्हारों द्वारा बनाए गए मिट्टी के कुल्हड़ बिकते थे । हालांकि मिट्टी के बर्तनों की मांग समय-समय पर होती रहती हैं जिससे कुम्हारों का व्यवसाय जिन्दा है । क्योंकि अधिकांश पूजा पाठ के लिए आज भी लोग मिट्टी के दीये का प्रयोग करते हैं । सबसे बड़ी मात्रा में दीयो का प्रयोग दीपावली में होती हैं जहां हजारों दीए से मिलाकर तरह-तरह रंगोली बनाए जाते हैं तो कही कही दीपकों से घर-आंगन सजाए जाते हैं । इसके अलावा सूर्य उपासना का पर्व छठ पूजा में भी मिट्टी के दीये और ढक्कन का उपयोग किया जाता हैं। हालांकि कुम्हारों की नई पीढ़ी अब धीरे धीरे मिट्टी के बर्तन बनाने के व्यवसाय से दूर भागते हुए नजर आ रहे हैं क्योंकि इसमें जितनी मेहनत है उतनी कमाई नही हो पाती हैं ।

मिटटी के दीए जलाने के हैं कई फायदे –

लोगों का मानना है कि दीपावली पर मिट्टी के दिये जलाएं जाने के कई फायदे भी हैं चाहे वह वैज्ञानिक हो या शास्त्रीय ।
शास्त्रों के अनुसार दीपावली पर्व में मिट्टी के दिये जलाने से बरसात में जन्म लिए हानिकारक कीड़े-मकोड़े मर जाते हैं और मिट्टी के दीयों से निकले लौ से वातावरण भी शुद्ध होता हैं ।इसलिए पुरानी मान्यतायों के अनुसार आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर त्योहारों पर मिट्टी के दीये बड़े जलाएं जाते हैं ।


अपने शहर के एप को डाउनलोड करने के लिए क्लिक करे |  हमें फेसबुक,  ट्विटर,  और यूट्यूब पर फॉलो करें|
loading...
error: Content is protected !!