प्रदोष व्रत करने से मनुष्य भगवान शिवशंकर की कृपा का बन जाता हैं पात्र

प्रत्येक माह में शुक्ल एवं कृष्ण पक्ष में त्रयोदशी के दिन प्रदोष व्रत रखा जाता है। प्रदोष काल दिन और रात के मिलन का वक्त होता है। इस समय भगवान शिवशंकर की पूजा उत्तम फल प्रदान करती है। प्रदोष काल में भगवान शिवशंकर कैलाश पर्वत के रजत भवन में नृत्य करते हैं और देवता उनके गुणों का स्तवन करते हैं। मान्यता है कि चंद्रमा को क्षय रोग था। भगवान शिवशंकर ने दोष का निवारण कर उन्हें त्रयोदशी के दिन पुन: जीवन प्रदान किया।

प्रदोष व्रत करने से मनुष्य भगवान शिवशंकर की कृपा का पात्र बन जाता है। एक वर्ष तक लगातार यह व्रत करने से मनुष्य के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। प्रदोष व्रत से सभी दोषों का निवारण होता है। प्रदोष व्रत में सूर्य उदय से पहले निद्रा त्याग दें। मन में गलत विचार न आने दें। इस व्रत में काले वस्त्र न पहनें। पूरे दिन निराहार रहकर मन ही मन ऊं नम: शिवाय का जाप करें। शाम को दुबारा स्नान कर स्वच्छ श्वेत वस्त्र धारण करें। इस व्रत में नमक का प्रयोग नहीं करना चाहिए। सायंकाल में भगवान शिवशंकर, माता पार्वती की आराधना करें। प्रदोष व्रत रखने से शरीर में चंद्र तत्व में सुधार होता है और मानसिक बैचेनी दूर हो जाती है।

नोट:
इस आलेख में दी गई जानकारियां धार्मिक आस्थाओं और लौकिक मान्यताओं पर आधारित हैं, जिसे मात्र सामान्य जनरुचि को ध्यान में रखकर प्रस्तुत किया गया है।


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