फिल्म ‘साहो’ की समीक्षा

नाम बड़े और दर्शन छोटे… 350 करोड़ के बजट में बनी साहो पर ये कहावत एकदम सटीक बैठती है. डायरेक्टर सुजीत की महज ये दूसरी फिल्म है. एक नए डायरेक्टर पर टी-सीरीज समेत दूसरे प्रोडयूसर्स और प्रभास का भरोसा करना वाकई सबसे बड़ा रिस्क था. लेकिन बाहुबली के बाद ब्रैंड बन चुके प्रभास की पॉपुलैरिटी को कैश कराने की चाहत में साहो से सभी जुड़ते चले गए.

मेकर्स ने साहो पर पानी की तरह पैसा बहाया. एक्शन और स्टंट सीन्स को हॉलीवुड लेवल का बनाने के लिए इंटरनेशनल एक्शन डायरेक्टर और उनकी टीम को बुलाया गया. प्रोजेक्ट को ग्रैंड बनाने के लिए बॉलीवुड एक्टर्स की लंबी चौड़ी फौज को जोड़ा. मगर. आखिर में फिल्म देखकर जो हाथ लगा…वो है “निराशा”.

कमजोर कहानी, जबरदस्ती का एक्शन:
साहो की सबसे बड़ी कमजोर कड़ी इसकी कहानी साबित हुई. इस फिल्म को भारत की सबसे बड़ी एक्शन एंटरटेनर मूवी के तौर पर प्रमोट किया गया. साहो में एक्शन भी भरपूर है. लेकिन सवाल है साहो में क्या इतना एक्शन जरूरी था? प्रभास के बाइक चेज सीक्वेंस पर 70 करोड़ खर्च करने की खबरें हैं. लेकिन क्या धुआं-धुआं कर 37 गाड़ियां और 5 ट्रक को राख करने का कोई मतलब था?

फिल्म का एक्शन जरूरत से ज्यादा और बेमतलबी लगता है. गाड़ियां हवा में उड़ रही हैं, जलकर राख हो रही हैं, बिल्डिंग धड़ाम-धड़ाम गिर रही हैं… डायरेक्टर का इन चीजों पर इतना ज्यादा फोकस रहा कि कहानी अपने रास्ते से भटकती चली गई. एक्शन को परोसने के चक्कर में बाकी सारी चीजें नजरअंदाज कर दी गईं.

बोरिंग कहानी, लंबी फिल्म:
साहो की कहानी में कई सारे ट्विस्ट एंड टर्न्स हैं. जो कि अंत तक बने रहते हैं. कौन पुलिस है, कौन चोर, कौन किसके साथ है, कौन धोखेबाज, इतने सारे विलेन्स में से कौन असली विलेन है…. ये सब जानने के लिए आपको फिल्म देख सकते हैं. प्रभास के “डाई हार्ट फैन” हैं तो देख सकते हैं. मगर सच्चाई तो ये है कि साहो बांधे रखने में नाकामयाब साबित होती है.

फर्स्ट हाफ बोरिंग है. एक तो किरदारों की भरमार है, और उन्हें जमाने में डायरेक्टर को कुछ ज्यादा ही वक्त लग गया. इंटरवल से थोड़ा पहले कहानी रफ्तार पकड़ती है. दिक्कत यह कि इंटरवल के बाद फिर सुस्त भी हो जाती है. क्लाइमेक्स की तरफ आते-आते कहानी में ढेर सारा एक्शन का डोज मिलता है, जो कि एक्शन लवर्स को एंटरटेन कर सकता है. गाने अच्छे हैं सभी गानों को पूरा दिखाया गया है, जिसकी वजह से भी फिल्म की लंबाई बढ़ी.

हॉलीवुड लेवल का स्टंट-एक्शन…सच में?
कहा गया था कि साहो में इंटरनेशनल क्वॉलिटी के स्टंट और एक्शन सीन्स दिखेंगे. लेकिन कुछ एक सीन्स को छोड़कर सब कुछ साउथ और बॉलीवुड की दूसरी एक्शन मसाला फिल्मों की तरह ही नजर आता है. फिल्म की शूटिंग ज्यादातर विदेशी लोकेशंस पर हुई है, जो कि शानदार है. मगर ये समझ से परे है कि नॉर्मल रोमांटिक गानों की शूटिंग पर भी लोकेशन को लेकर इतना खर्च क्यों कर दिया गया? मानो ज्यादा बजट मिलने पर मेकर्स को बस पैसे खर्च करने थे. कुछ सीन्स में साफ मालूम पड़ता है कि VFX इस्तेमाल हुए हैं.

कैसी है फिल्म में एक्टिंग?
प्रभास ने साहो को 2 साल दिए. जैसा कि उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा भी था कि उनका इसे 2 साल देने का इरादा नहीं था. लेकिन एक्शन फिल्म होने के नाते ज्यादा समय लगा. प्रभास के जिन फैंस ने बाहुबली देखी हो वो साहो में एक्टर को देखकर निराश हो सकते हैं. प्रभास की एक्टिंग में एक्स फैक्टर मिसिंग दिखा. इस मूवी में प्रभास अपना बेस्ट देने में असफल लगे. फिल्म में प्रभास ने हिंदी में अपने डायलॉग खुद बोले हैं. उनकी कोशिश अच्छी है, पर कई सीन्स में डायलॉग डिलीवरी कमजोर रही है. एक्शन सीक्वेंस में प्रभास दमदार लगे.

श्रद्धा कपूर ठीक-ठाक लगी हैं. इतना जरूर है कि साहो जैसी मल्टीस्टारर मूवी में उन्हें अच्छा स्क्रीन स्पेस मिला है. चंकी पांडे विलेन के रोल में जमे हैं. जैकी श्रॉफ, मंदिरा बेदी, अरुण विजय, महेश मांजरेकर के पास करने का ज्यादा खास नहीं था. नील नितिन मुकेश खासा इंप्रेस नहीं कर पाए.

साहो में ढेरों कमियां हैं, प्रभास फैक्टर भी मिसिंग है. बाहुबली 2 की सफलता के बाद मूवी को लार्जर दैन लाइफ और ग्रैंड बनाने के चक्कर में डायरेक्टर ने पूरी फिल्म को खराब कर दिया.

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