इस व्रत के प्रभाव से राजा हरिश्चंद्र को उनका खोया हुआ राजपाठ मिला था वापस,जानें


भाद्रपद कृष्ण पक्ष एकादशी को अजा एकादशी कहा जाता है। भगवान श्रीहरि विष्णु का समर्पित इस व्रत को विधि विधान से करने से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। अजा एकादशी का व्रत श्रेष्ठतम व्रतों में से एक माना जाता है। इस एकादशी को कामिका या अन्नदा एकादशी भी कहा जाता है। यह व्रत जीवन में संतुलन बनाना सीखता है और मन को निर्मल करता है। इस व्रत के प्रभाव से राजा हरिश्चंद्र को उनका खोया हुआ राजपाठ वापस मिला और उनका पुत्र भी जीवित हो उठा।

अजा एकादशी व्रत में दशमी तिथि की रात्रि में मसूर की दाल नहीं खानी चाहिए। न ही चने या चने के आटे से बनी चीजें खानी चाहिए। शहद खाने से भी बचना चाहिए। ब्रह्मचर्य का पूर्ण रूप से पालन करना चाहिए। इस व्रत में भगवान विष्णु की पूजा में धूप, फल, फूल, दीप, पंचामृत आदि का प्रयोग करें। इस व्रत में द्वेष भावना या क्रोध को मन में न लाएं। परनिंदा से बचें। इस व्रत में अन्न वर्जित है। एकादशी पर रात्रि जागरण का बड़ा महत्व है। रात्रि में जागरण कर भगवान का भजन कीर्तन करें। मान्यता है कि एकादशी के दिन विष्णुसहस्रनाम का पाठ करने से भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है। द्वादशी तिथि को ब्राह्मण को भोजन कराएं और इसके बाद स्वयं भोजन करें। एकादशी के दिन चावल नहीं खाना चाहिए। व्यस्नों से दूर रहना चाहिए। किसी भी पेड़ की डाली ना तोड़ें। किसी प्रकार हिंसा न करें। इस एकादशी व्रत में दान का विशेष महत्व है। विधि विधान से व्रत रखने से भगवान श्रीहरि विष्णु के साथ माता लक्ष्मी का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

नोट:
इस आलेख में दी गई जानकारियां धार्मिक आस्थाओं और लौकिक मान्यताओं पर आधारित हैं, जिसे मात्र सामान्य जनरुचि को ध्यान में रखकर प्रस्तुत किया गया है।

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