पिछड़े जनपद में योगी सरकार का दावा फेल, बजट के अभाव में बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़

21 अगस्त 2019

आनन्द कुमार चौबे (संवाददाता)

सोनभद्र । योगी सरकार भले ही मंत्रिमंडल में फेरबदल कर सरकार को बेहतर चलाने की सोच रहे हो। मगर जिन अधिकारियों के भरोसे सरकार यह सपना देख रही है उनके अधिकारी सरकार की ही भद्द पीटने पर लगी है। दरअसल पिछड़े जनपदों में बेहतर शिक्षा प्रणाली लागू करने के उद्देश्य से सरकार सरकारी स्कूलों में त्रैमासिक परीक्षा कराकर बच्चों के ज्ञान को बढ़ाने पर लगी है लेकिन जनपद में योगी सरकार के भरोसेमंद अधिकारी शिक्षा को लेकर योगी सरकार के बड़े-बड़े दावे की पोल खोलकर रख दी। दरअसल सोनभद्र में इन दिनों सरकारी प्राथमिक व उच्च प्राथमिक स्कूलों में त्रैमासिक परीक्षा कराई जा रही है लेकिन योगी सरकार के अधिकारी परीक्षा में बच्चों को प्रश्नपत्र देने के बजाय अध्यापकों के मोबाइल पर ही पेपर भेजकर गोपनीयता के साथ परीक्षा कराने का आदेश दे दिया। अब अध्यापक अपनी नौकरी बचाने के लिए मोबाइल से ब्लैकबोर्ड पर प्रश्नों को उतार कर परीक्षा ले रहा है। पूरे मामले पर जनपद न्यूज़ live की टीम ने जमीनी हकीकत जानने के लिए जनपद मुख्यालय के कुछ विद्यालयों पर जाकर तहकीकात की। तहकीकात के दौरान कुछ चौकाने वाले तथ्य निकल कर सामने आए और यह भी सामने आया कि पिछड़े जनपद में कैसे सरकारी तंत्र परीक्षा के नाम पर बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रही है।

-एक रिपोर्ट-

– योगी सरकार के दावे की खुली पोल

– पिछड़े जनपदों में बजट के अभाव में बच्चों की शिक्षा प्रणाली के साथ हो रहा खिलवाड़

– देश के 115 पिछड़े जनपदों में शामिल जनपद सोनभद्र को नीति आयोग में किया गया था शामिल

– नीति आयोग बनाकर इन पिछड़े जनपदों को अग्रणी जनपद बनाने के सरकार के दावे की खुली पोल

– बीएसए ने बताया पिछड़े जनपद में कैसे रही बजट की कमी

– बजट की कमी कज़ कारण कैसे बच्चों के भविष्य के साथ हो रहा खिलवाड़

– त्रैमासिक परीक्षा में स्कूल के दीवारों, पीलरों व ब्लैक बोर्ड पर प्रश्न पत्र लिखकर लिया जा रहा बच्चों की परीक्षा

– परीक्षा के नाम पर खानापूर्ति

– बीएसए बता रहे हैं समय व बजट का अभाव

– आखिर कैसे चलेगी योगी सरकार में नीति आयोग

नीति आयोग में शामिल जनपदों में शिक्षा की गुणवत्ता व बच्चों के ज्ञान को बढ़ाने के उद्देश्य से सरकार द्वारा थर्ड पार्टी के मॉनेटरिंग नियुक्त कर त्रैमासिक परीक्षा कराई जा रही है लेकिन जनपद में हो रही त्रैमासिक परीक्षा इन दिनों जनपद में चर्चा के विषय बना हुआ है। बेसिक शिक्षा विभाग से हर दिन पेपर सभी अध्यापकों के मोबाइल पर व्हाट्सअप कर दिया जाता है। फिर अध्यापक उसी प्रश्न पत्र को देखकर दीवारों पीलरों या बोर्ड पर लिखकर परीक्षा करा रहे हैं। कई स्कूलों में तो जगह न होने की स्थिति में बाहर बिठाकर परीक्षा कराई जा रही है और प्रश्न दीवार पर लिख दिया जा रहा है। अजीबो गरीब तरीके से कराई
जा रही परीक्षा पर अध्यापकों का कहना है कि 10 नम्बर के प्रश्न पत्र को इतना बड़ा बना दिया गया है कि पहले उसे अध्यापक मोबाइल से ब्लैक बोर्ड पर उतारता है फिर बच्चे उसी प्रश्नों को अपनी कॉपी पर उतरता है तब जाकर वह हल कर पाता है।

अध्यापक गायत्री त्रिपाठी का कहना है कि कई स्कूलों पर जहां नेटवर्क ही नहीं है वहां प्रश्न पत्र का पीडीएफ फाइल ही नहीं खुल रहा, जिससे अध्यापक बेहद परेशान हैं । उनका कहना है कि अधिकारियों को प्रश्न पत्र की व्यवस्था करनी चाहिए ।

वहीं अन्य अध्यापिकाओं अनिता और माधुरी ने बताया कि उनके मोबाइल पर प्रश्न पत्र भेजा गया है जिसे ब्लैक बोर्ड पर लिखकर परीक्षा कराई जा रही है।

त्रैमासिक परीक्षा को लेकर बच्चे भी बेहद परेशान हैं। उन्हें कभी कोई प्रश्न दीवारों पर तो कई पीलर या फिर कुछ ब्लैक बोर्ड पर लिखे मिलने से खोजने में दिक्कतें आ रही हैं।

बच्चों सतीश और पवन का कहना है कि यदि उन्हें प्रश्न पत्र मिल गया होता तो संमय भी बचता और परीक्षा भी अच्छे से दे पाते।

इस पूरे परीक्षा को लेकर जब बेसिक शिक्षा अधिकारी गोरखनाथ पटेल ने सरकार के दावे की पोल खोल कर रखते हुए बताया कि पिछड़ा जनपद होने की वजह से सरकार शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने के उद्देश्य से यह परीक्षा कराती है जिसकी मॉनिटरिंग थर्ड पार्टी करती है और बच्चे के ज्ञान की परीक्षा का आंकलन किया जाता है लेकिन सरकारी बजट व समयाभाव के कारण प्रश्न पत्र तैयार कर अध्यापकों के मोबाइल पर उपलब्ध करा दिया गया था और सही तरीके से परीक्षा कराने का निर्देश भी जारी कर दिया गया था।

सरकार परिषदीय स्कूलों को बेहतर बनाने को लेकर भले ही मंच से या प्रचार के माध्यम से बड़े-बड़े दावे कर ले लेकिन पिछड़े जनपदों में जमीनी हकीकत क्या है यह इस छोटी सी परीक्षा प्रणाली ने खोलकर रख दी। शायद यही कारण है कि सरकार द्वारा तमाम सुविधाओं के एलान के बाद भी स्कूलों में बच्चों की संख्या उस अनुपात में नहीं बढ़ रही जिसका सपना सरकार देख रही है।


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