धान में लगने वाले प्रमुख कीट/रोग एवं उनका प्रबंध/नियंत्रण हेतु दवाओ का करें प्रयोग

13 अगस्त 2019
दीनदयाल शास्त्री ब्यूरो

पीलीभीत। किसान भाईयों को सूचित किया जाता है कि इस समय वर्षा कम होने एवं तापमान अधिक होने के कारण धान की फसल में पत्ती लपेटक, तना भेदक एवं भूरा फूदका के आने की सम्भावना है। जिनका प्रबंधन/नियंत्रण अति आवश्यक है। पत्ती लपेटक की पहचान यह लार्वा अवस्था में हानि पहुंचाते है, पत्तियों के दोनों किनारों को जोड़कर नली जैसी संरचना बनाकर उसके अन्दर रहते है तथा पत्तियों की हरियाली को खुरचकर खाते है। पत्ती का प्रभावित हिस्सा सफेद एवं सूखा हो जाता है। जिसके नियत्रंण हेतु किसान भाई खेत एवं मेड़ों को घास मुक्त एवं मेडों की छटाई कर देनी चाहिए,समय से रोपाई करना चाहिए, फसल की साप्ताहिक निगरानी रखनी चाहिए, प्रभावित क्षेत्रफल अधिक होने पर नियंत्रण हेतु क्लोस्इरीफास 20ईसी 500 मिलीलीटर एकड़ अथवा एसीफेट 75प्रतिशत एसपी 400 मिलीलीटर/एकड़ अथवा मोनोकोटोफास 36प्रतिशत एसएल1.25 लीटर प्रति हेक्टेयर अथवा क्यूनालफास 25ईसी 1.5 लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से 400 से 500 लीटर पानी में घोलकर छिडकाव करें।
तना भेदक की पहचान- इस कीट का लार्वा कल्ले के निचले हिस्से को भेदकर अन्दर से खाता है, जिससे यह सूख जाता है जिसे मृत गोभ कहते है। प्रभावित पौधों की पेनिकल एवं बाली सूख जाती है तथा खींचने पर आसानी से खिच जाती है। इस रोग के नियंत्रण हेतु गर्मी में गहरी जुताई, खेत की मेड़ों की साफ सफाई व छटाई व निगरानी करनी चाहिए। रासायनिक नियत्रंण हेतु कार्बोफयूरान 3जी 25किग्रा/प्रति हेक्टेयर अथवा क्लोरेन्ट्रानिलिप्रोल 0.4प्रतिशत जी 10 कि0ग्रा0/हे0 की दर से खेत में नमी की अवस्था में बुरकाव करें। मोनोक्रोटोफास 36प्रतिशत एसएल, 1.25 ली0/हे0 अथवा 25ईसी 1.5 ली0/हे0 अथवा क्लोरेन्ट्रानिलिप्रोल 18.5एससी 150मि0ली0/हे0 अथवा फिप्रोनिल 5प्रतिशत एससी 1.5 ली0/हे0 अथवा थायोमेथक्साम 25प्रतिशत डब्लूजी 100ग्रा/हे0 की दर से 400 से 500 ली0 पानी में घोलकर छिडकाव करें। भूरा फुदका की पहचान- इस कीट के शिशु तथा प्रौढ कत्थई रंग के पंखों अथवा बिना पंख के भी होते है तथा दोनों पौधो के निचले हिस्से से रस चूसते है। प्रभावित हिस्से में अवशेष रस के कारण काला फफूद उग आता है, प्रभावित पौधे छोटे रह जाते है तथा सूख जाते है, इसे हापर बर्न कहते है। प्रकोप अधिक होने पर पौधे गिर जाते है तथा धान में चावल नही बनते हैं। इसके नियत्रंण हेतु कार्बोफयूरान 3जी 25किग्रा/हे0 अथवा क्लोरेन्ट्रानिलिप्रोल 0.4प्रतिशत जी 10 कि0ग्रा0/हे0 की दर से खेत में नमी की अवस्था में बुरकाव करें तथा फास्फोमिडान 40प्रतिशत एसएल 01 ली/हे0, क्लोरपाइरीफास 20ईसी 500मि0ली0 एकड़ अथवा एसीफेट 75प्रतिशत एसपी 400 मि0ली0/एकड़ अथवपा मोनोक्रोटोफास 36प्रतिशत एसएल 1.25 ली0/हे0 अथवा क्लोपाइरफास 20प्रतिशत ईसी 1.25 ली0/हे0 की दर से पानी में घोलकर छिडकाव करें।
झोंका रोग की पहचान- इस रोग में पत्तियों पर आँख के आकार के धब्बे बनते है, जो बीच में राख के रंग के तथा किनारों पर गहरे कत्थई रंग के होते है। इसके नियत्रंण हेतु समय से रोपाई एवं फसल चक्र अपनाना चाहिए, फसल की निगरानी करनी चाहिए, कार्बेन्डाजिम 50प्रतिशत डब्लूपी 500ग्रा0/हे0 अथवा हेक्साकोनाजोल 5प्रतिशत ईसी 1 ली0/हे0 अथवा मैंकोजेब 75प्रतिशत डब्लूपी 2 कि0ग्रा0/हे0 की दर से छिडकाव करें। अधिक जानकारी के लिए जिला कृषि रक्षा अधिकारी पीलीभीत से सम्पर्क करें।


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