हजरत इब्राहिम की कुर्बानी की याद में मनाई जाती हैं बकरीद


बकरीद का दिन फर्ज-ए-कुर्बान का दिन है। हजरत इब्राहिम की कुर्बानी की याद में बकरीद मनाई जाती है। हजरत इब्राहिम, अल्लाह के हुक्म पर अपने बेटे इस्माइल की कुर्बानी देने को तैयार हुए थे।

इस्लाम में मीठी ईद यानि ईद-उल-फितर के बाद बकरीद सबसे प्रमुख त्योहार है। ऐसा बताया जाता है कि अल्लाह ने एक दिन हजरत इब्राहिम से सपने में उनकी सबसे प्रिय चीज की कुर्बानी मांगी। हजरत इब्राहिम अपने बेटे से बहुत प्यार करते थे, लिहाजा उन्होंने अपने बेटे की कुर्बानी देने का फैसला किया। अल्लाह का हुक्म मानते हुए हजरत इब्राहिम ने जैसे ही अपनी आंखें बंद कर अपने बेटे की गर्दन पर वार किया तो अल्लाह ने उन्हें बचाकर एक दुम्बा की कुर्बानी दिलवा दी, तभी से बकरीद मनाने का प्रचलन शुरू हुआ। बकरीद पर गरीबों का विशेष ध्यान रखा जाता है। बकरीद के दिन कुर्बानी के गोश्त को तीन हिस्सों में बांटा जाता है। एक खुद के लिए, दूसरा सगे-संबंधियों के लिए और तीसरा गरीबों के लिए। बकरीद के दिन उन मुस्लिमों पर अल्लाह तालाआ ने कुर्बानी करना फर्ज फरमाया है, जिनके पास साढ़े 52 तोला चांदी, साढ़े सात तोला सोना व इतनी ही नकदी हो। उस पर किसी का कर्ज न हो।



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