Immunity बढ़ाने के लिए अपनाएं ये योगासन, जानें इनके फायदे और करने का तरीका

आधुनिक जीवनशैली में हमारा खानपान और रहन-सहन जिस तरह से प्रभावित हुआ है, उसका असर हमारे शरीर की प्रतिरोधक क्षमता पर भी पड़ा है। कमजोर प्रतिरोधक क्षमता की स्थिति में हमारा शरीर बीमारियों का सामना नहीं कर पाता। आप अपनी प्रतिरोधक क्षमता को यौगिक क्रियाओं से भी मजबूत बना सकते हैं, बता रहे हैं योग विशेषज्ञ डॉ. वरुण वीर

शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बेहतर बनाने में हमारे खानपान का तो महत्वपूर्ण योगदान होता ही है, व्यायाम और योगासन भी इस काम में खूब कारगर साबित होते हैं। उनमें कुछ ऐसे प्राणायाम और आसन भी हैं, जो प्रतिरोधक शक्ति बढ़ाने में अत्यधिक सहायक साबित होते हैं। 10 से 15 दिन ही इनका अभ्यास करने से लाभ महसूस होने लगता है। आइए जानते हैं कुछ ऐसे ही योगासनों के बारे में-

पश्चिमोत्तानासन
समतल जमीन पर बैठें। दोनों पैर सीधे रखते हुए कमर सीधी रखें। गहरी लंबी सांस भरते हुए दोनों हाथों को एक साथ ऊपर उठाएं। श्वास भरते हुए आगे की ओर झुकें और पंजों को हाथों से पकड़ने की कोशिश करें। जितनी सरलता पूर्वक आगे की ओर झुक सकें, झुकें और माथे को घुटने से छूने का प्रयास करें। इस स्थिति में दो-तीन मिनट तक सरलता पूर्वक रुकें। श्वास सामान्य रखें तथा ध्यान शरीर के खिंचाव तथा दबाव पर रखें। अब जिस प्रकार से आसन आरंभ किया था, उसी विपरीत क्रम से आसन को समाप्त करें।

धनुरासन
पेट के बल लेटकर पीछे से दाएं पैर के टखने को दाएं हाथ से तथा बाएं पैर के टखने को बाएं हाथ से पकडें। गहरी और लंबी श्वास भरते हुए आगे से छाती और कंधों को तथा पीछे से दोनों पैरों और जांघों को ऊपर उठाएं। फिर पैरों को आकाश की दिशा में ले जाएं और सांस को सामान्य छोड़ दें। एक मिनट से शुरू कर 3 से 5 मिनट तक इस आसन का अभ्यास करें। आसन में ध्यान नाभि केंद्र पर रखें और हृदय की तरह नाभि में भी धड़कन महसूस करें।

सर्वांगासन
पीठ के बल लेटें। उसके बाद अपने दोनों हाथों की सहायता से अपने दोनों पैरों और कमर को ऊपर की ओर उठाएं। इस स्थिति में शरीर का सारा वजन दोनों कंधों तथा सिर पर आ जाएगा। इस स्थिति में सिर और गर्दन को एक सीध में रखें, दाएं या बाएं मोड़ने का प्रयास बिल्कुल न करें। 3 से 5 मिनट तक इस आसन का अभ्यास करें।

हलासन
सर्वांगासन की ही स्थिति में रहते हुए दोनों पैरों को सिर के पीछे जमीन पर सटाने का प्रयास करें। शरीर में सबसे अधिक दबाव गर्दन तथा कंधों पर आएगा और खिंचाव रीड की हड्डी में अनुभव होगा। थोड़ी देर थाइरॉइड ग्लैंड पर दबाव बनेगा। श्वास की गति सामान्य रखें। इस स्थिति में लगभग 3 से 5 मिनट तक खुद को रोकने का प्रयास करें। फिर धीरे-धीरे वापस पूर्व स्थिति में आएं। पूर्व स्थिति में आने के लिए दोनों हाथों को जमीन पर रखते हुए सहारा लें और धीरे-धीरे कमर, नितंब तथा दोनों पैरों को सहज भाव से जमीन पर ले आएं। 5 से 10 बार गर्दन को दाएं से बाएं मोड़ें, जिससे गर्दन में कोई खिंचाव या दबाव न आए।

कपालभाति प्राणायाम
इस प्राणायाम में कमर सीधी रखते हुए दोनों हाथों को घुटनों पर ज्ञान मुद्रा में रखें। धीरे-धीरे श्वास को नाक से बाहर छोड़ने की कोशिश करें। इस बात का ध्यान रखें कि श्वास लेने की आवाज न आए, बल्कि श्वास छोड़ने की आवाज तीव्र गति से आए। जैसे छींकने की आवाज आती है, उसी तरह इस प्राणायाम में भी तेज आवाज आती है।

भस्त्रिका प्राणायाम
इस प्राणायाम में श्वास को तीव्र गति से अंदर और बाहर करना होता है। श्वास अंदर लेते हुए पेट बाहर तथा श्वास छोड़ते समय पेट अंदर रखें। इस प्राणायाम से फेफड़ों की शुद्धि होती है और तथा उसे काफी शक्ति भी प्राप्त होती है।

उज्जाई प्राणायाम
नाक से गहरी व लंबी श्वास भीतर लेते हुए अपनी ग्रीवा की अंतरंग मांसपेशियों को सख्त रखें। श्वास लेते व छोड़ते समय कंपन महसूस करें। ध्यान रहे कि श्वास-प्रश्वास की क्रिया नाक से ही पूरी करनी है।

खानपान पर ध्यान देने के साथ 15 से 20 दिनों तक लगातार इन क्रियाओं का अभ्यास करने से आपके शरीर की प्रतिरोधक क्षमता काफी मजबूत हो जाएगी।


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